भारतीय सविधान के भाग
भारतीय
संविधान के भाग
भाग अनुच्छेद
1 संघ एवं उसका राज्य क्षेत्र 1 से 4
2 नागरिकता 5 से 11
3 मौलिक
अधिकार
12 से 35
4 नीति निर्देशक
तत्व
36 से 51
4 (क) मूल
कर्तव्य
51 (क)
5 संघ
52 से 151
6 राज्य
152 से 237
7 पहली अनुसूची
के भाग ख के राज्य 238 (निरसित)
8 संघ राज्य
क्षेत्र
239 से 242
9 क पंचायत
243, 243 क से ग तक
9 ख सहकारी
समितियां
243 त से 243 ह
10 अनुसूचित और
जनजातीय क्षेत्र 244, 244 क
11 संघ और
राज्यों के बीच संबंध 245 से 263
12 वित्त संपत्ति
संविदाये और वाद 264 से 300 क
13 भारत के राज्य
क्षेत्र के भीतर व्यापार वाणिज्य एवं समागम 301 से 307
14 संघ एवं
राज्यो के अधीन सेवाएं 308 से 323
14 क अधिकरण 323 क, 323 ख
15 निर्वाचन
324 से 329
16 कुछ वर्गों के
संबंध में विशेष उपबंध 342 से 350
17 राजभाषा
343 से 351
18 आपात
उपबंध
352 से 360
19 प्रकीर्ण
361 से 367
20 संविधान
संशोधन 368
21 अस्थाई
संक्रमणकालीन और विशेष उपबंध 369 से 392
22 समता या
समानता का अधिकार अनुच्छेद 14
से 18
23 संक्षिप्त नाम
प्रारंभ, हिंदी में प्राधिकृत पाठ और निरसन 392 से 395
मौलिक कर्तव्य
1 समता या समानता
का अधिकार
अनुच्छेद 14 से 18
2 स्वतंत्रता का
अधिकार
अनुच्छेद 19 से 22
3 शोषण के
विरुद्ध अधिकार अनुच्छेद
23 से 24
4 धार्मिक
स्वतंत्रता का अधिकार अनुच्छेद 25
से 28
5 संस्कृत और
शिक्षा संबंधी अधिकार अनुच्छेद 29 से
30
6 संवैधानिक
उपचारों का अधिकार अनुच्छेद
32
सविधान
(constitution)
सभी के लिए बराबर
कानून को संविधान कहते हैं भारतीय संविधान में 22 भाग तथा 395 अनुच्छेद है |
भाग - 1
संघ और राज्य क्षेत्र (1 - 4)
अनुच्छेद
1 - भारत राज्यों का संघ
(Union) है अर्थात् इसके राज्य कभी भी टूट कर अलग नहीं हो सकते हैं |
Note - जो देश Federation
होते हैं उसके राज्य टूट सकते हैं जैसे - सोवियत संघ U.S.A.
अनुच्छेद 2 - संसद
राष्ट्रपति को पूर्व सूचना देकर किसी भी विदेशी राज्य को भारत में शामिल कर सकता
है |
EX. - 16
मई 1975 के सिक्किम का भारत में विलय
अनुच्छेद
3 - संसद राष्ट्रपति को पूर्व सूचना देकर वर्तमान
किसी भी राज्य के नाम तथा सीमा को बदल सकते हैं |
जैसे - उड़ीसा से उड़ीसा
अनुच्छेद
4 - अनुच्छेद 2 और 3 में
किया गया संशोधन अनुच्छेद 368 के बाहर रखा गया है अतः इस संशोधन को राष्ट्रपति
नहीं रोक सकते हैं |
भारतीय राज्यों
का इतिहास
आजादी के समय
भारत 552 से अधिक देशी रियासत (राज्य) में टूटा हुआ था अंग्रेजों ने इन्हे यह अधिकार दिया कि यह
राज्य भारत में मिल सकते हैं या पाकिस्तान में मिल सकते हैं या स्वतंत्र देश के
रूप में बन सकते हैं इन रियासतों को भारत में मिलने का कार्य सरदार पटेल तथा के के
मेनन ने किया उन्होंने सभी राज्यों को भारत में विलय करा दिया किंतु 3 राज्य विलय
के लिए तैयार नहीं थे |
जम्मू-कश्मीर - यह स्वतंत्र देश बनना चाहता था यहां के राजा
हरि सिंह थे और उनका प्रधानमंत्री शेख अब्दुल्ला था इसी बीच पाकिस्तान के इशरा पर
कश्मीर में घुसपैठ होने लगी जिसके बाद 26 अक्टूबर 1947 को कश्मीर विलय पत्र पर
हस्ताक्षर करके भारत का अंग बन गया |
जूनागढ़ - गुजरात का एक रियासत था जो पाकिस्तान में जाना
चाहता था किंतु पटेल ने जनमत संग्रह करा कर उसे भारत में मिला दिया |
हैदराबाद - हैदराबाद के निजाम हैदराबाद को पाकिस्तान में
मिलना चाहते थे किंतु सरदार पटेल ने पुलिस की वर्दी में सेना भेजा जिसे ऑपरेशन
पोलो का आ गया इसी के तहत हैदराबाद को भारत में मिला लिया गया |
इन सभी देसी
रियासतों को मिलाकर एक भारत का निर्माण किया गया इस भारत को चार राज्यों में A, B, C, D में बांटा गया |
भाषाई आधार पर
राज्यों का गठन के लिए 1949 में एस. के. घर आयोग का गठन किया गया किंतु इसने भाषाई
के आधार पर राज्यों के गठन का विरोध किया |
तेलुगु भाषा के
लिए अलग राज्य की मांग करते हुए पट्टू श्री रामल भूख हड़ताल पर बैठ गया और 56 दिन
की भूख हड़ताल के बाद उनकी मृत्यु हो गई फलस्वरुप जनता का विरोध बढ़ गया फलस्वरुप
नेहरु जी ने 10 अक्टूबर 1953 में तेलुगु भाषा के लिए अलग राज्य आंध्र प्रदेश को
अलग कर दिया गया अंततः यह भाषा के आधार पर गठित होने वाला पहला राज्य बना |
भाषाई आधार पर
राज्यों का गठन के लिए 1953 में फजल अली आयोग का गठन किया गया इस ने अपनी रिपोर्ट
1956 में दिया और भाषाई आधार पर राज्यों को कानूनी मान्यता दे दिया इस आयोग के फलस्वरुप
7 वां संविधान संशोधन 1956 में पारित हुआ इसके बाद A, B, C, D को रद्द करके भाषाई आधार पर 14 राज्य तथा 6 केंद्र शासित प्रदेश बनाए गए |
नोट
- पंजाब राज्य का पुनर्गठन साह आयोग की सिफारिश पर हुआ |
नागरिकता
कोई भी देश अपने
मूल निवासियों को कुछ विशेष अधिकार देता है इन अधिकारों को ही नागरिकता कहा जाता
है भारत में एकहरी नागरिकता है अर्थात हम केवल देश के नागरिक हैं राज्यों को
नागरिक नहीं बल्कि निवासी है भारत में नागरिकता ब्रिटेन से लिया गया है |
भारत की नागरिकता
1950 के अधिनियम पर आधारित है नागरिकता में पहली बार संशोधन 1986 में किया गया था
नागरिक होने के कारण है पैन कार्ड, आधार कार्ड दिया जाता है गेर नागरिक को यह
सुविधा उपलब्ध नहीं है |
नागरिक की चर्चा भाग - 2 में
अनुच्छेद (5 से 11) तक है |
अनुच्छेद 5 - संविधान प्रारंभ में दी गई नागरिकता
अर्थात् जब संविधान बना तो उन सभी लोगो को नागरिकता दी गई जो उसे समय भारत के अंदर
थे |
अनुच्छेद 6 - पाकिस्तान से भारत में आए लोगों को
नागरिकता किंतु यदि वह संविधान बनने के बाद आएंगे तो नागरिकता नहीं मिलेगी |
अनुच्छेद 7 - स्वतंत्रता के बाद भारत से पाकिस्तान चले
गए ऐसे व्यक्ति जो संविधान बनने से पहले लौट आई तो उन्हें नागरिकता दे दी जाएगी |
अनुच्छेद 8 - विदेश भ्रमण एवं नौकरी करने पर भारत की
नागरिकता समाप्त नहीं होगी |
अनुच्छेद 9 - विदेशी नागरिकता लेने पर भारत की नागरिकता
समाप्त कर दी जाएगी |
अनुच्छेद 10 - भारतीयों की नागरिकता बनी रहेगी तब तक जब
तक कि वह कोई देश विरोधी कार्य नहीं करते |
अनुच्छेद 11 - नागरिकता संबंधी कानून संसद बनाती है यह
जिम्मेदारी ग्रहमंत्रालय को दे दी गई है |
नागरिकता प्राप्त करने की विधियां
भारत में नागरिकता प्राप्त करने की पांच विधियां है |
जन्म के आधार पर
भारत में जन्म लेने वाले सभी बच्चों को नागरिकता दी जाएगी यदि उनके माता-पिता भारत
के नागरिक हो तो |
EX. - हम सभी |
विदेश में जन्म
लेने वाले बच्चों को भी नागरिकता दी जाएगी यदि उनके माता-पिता या दोनों में से कोई
एक भारत का नागरिक हो |
EX. - शिखर धवन
किसी विदेशी राज्य को भारत में मिला लेने पर वहां के लोगों को नागरिकता दे दी जाएगी सिक्किम का भारत में विलय होने के बाद वहां के निवासियों को दे दी गई है नागरिकता बांग्लादेश के परगना जिले को नागरिकता |
पंजीकरण - इसी विधि द्वारा नागरिकता प्राप्त करने के लिए व्यक्ति को 5 साल लगातार भारत में रहना होगा इस विधि द्वारा राष्ट्रमंडल देशों को नागरिकता दी जाती है |
देसीकरण - वैसा व्यक्ति जो भारत के किसी एक भाषा को जानता हो भारत के प्रति सकारात्मक सोच रखता है वैज्ञानिक या कला में निपुण हो साथी लगातार भारत में 10 वर्षों तक रहा हो |
Overseas नागरिकता - इसे 2005 में लक्ष्मी मल सिंघवी समिति द्वारा जोड़ा गया यह बड़े-बड़े उद्योगपतियों को दिया जाता है जो विदेशी नागरिकता ग्रहण कर लेते हैं इस नागरिकता को प्राप्त करने वाला व्यक्ति बिना वीजा के भारत आ सकता है |
नोट - देश विरोधी काम करने या पागल हो जाने या दूसरे राष्ट्र के प्रभाव में आ जाने पर गृह मंत्रालय द्वारा नागरिकता समाप्त की जा सकती है |
वीजा - किसी दूसरे देश में जाने के लिए अनुमति की आवश्यकता होती है अनुमति को ही वीजा करते हैं बिना वीजा किसी दूसरे देश में प्रवेश नहीं कर सकते |
पासपोर्ट - अपने देश को छोड़कर दूसरे देश में जाने के
लिए खुद अपने देश से अनुमति लेनी पड़ती है जिसे पासपोर्ट कहते हैं |
भाग-3
मूल अधिकार (अनुच्छेद 12 से 35)
मूल अधिकार को नैसर्गिक अधिकार कहते हैं क्योंकि यह जन्म के बाद मिल जाता है मूल अधिकार को जैगनाकारा कहते हैं इसे U. S. A. के संविधान से लिया गया है |
अनुच्छेद 15 - मूल अधिकार की परिभाषा
अनुच्छेद 13 - यदि हमारे मूल अधिकार को किसी दूसरे मूल अधिकार प्रवाहित करें, तो हमारे मूल अधिकार पर रोक लगाया जा सकता है | (अल्पी करण)
समता/समानता का अधिकार (अनुच्छेद 14 से 18)
अनुच्छेद 14 - विधि के समक्ष समानता अर्थात् कानून के सामने सब समान है यह व्यवस्था ब्रिटेन से ली गई है जबकि कानून के समान संरक्षण की व्यवस्था अमेरिका से ली गई है |
अनुच्छेद 15 - जाति धर्म लिंग जन्म स्थान के आधार पर सार्वजनिक स्थान (सरकारी स्थान) पर भेदभाव नहीं किया जाएगा |
अनुच्छेद 16 - लोक निर्वाचन सरकारी नौकरी की समानता इन में पिछड़े वर्ग के लिए कुछ समय आरक्षण की चर्चा है |
अनुच्छेद 17 - अस्पृश्यता (छुआछूत का अंत)
अनुच्छेद 18 - उपाधियों के अंत (किंतु शिक्षा सुरक्षा तथा भारत रतन पदम विभूषण इत्यादि रख सकते हैं) विदेशी उपाधि रखने के पूर्व राष्ट्रपति से अनुमति लेनी पड़ेगी |
स्वतंत्रता का अधिकार (अनुच्छेद 19 – 22)
अनुच्छेद 19 – 1 अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, बोलने की स्वतंत्रता, झंडा लहराने की स्वतंत्रता, पुतला जलाने की स्वतंत्रता तथा प्रेस की स्वतंत्रता
2 बिना हथियार सभा करने की स्वतंत्रता
3 संगठन बनाने की स्वतंत्रता
4 बिना रोक-टोक चारों ओर घूमने की स्वतंत्रता
5 भारत में कृषि क्षेत्र में बसने की स्वतंत्रता
6 संपत्ति का अधिकार अब यह मूल अधिकार नहीं रहा बल्कि कानूनी अधिकार हो गया |
संपत्ति के अधिकार को 44 वर्ष संविधान संशोधन द्वारा 1978 में मौलिक अधिकार से हटा दिया गया अब इसे अनुच्छेद 300 (क) के तहत कानूनी अधिकार में रखा गया |
7 व्यवसाय करने की स्वतंत्रता
अनुच्छेद 20 - इसमें तीन प्रकार की स्वतंत्रता दी गई है |
1 एक गलती की एक सजा
2 सजा उस समय के कानून के आधार पर दी जाएगी ने की पहले या बाद के कानून के आधार पर
3 सजा के बाद भी कैदी को संरक्षण दिया जाता है
नोट - अनुच्छेद 20 के अनुसार जब तक किसी व्यक्ति को न्यायालय दोषी करार नहीं देती है तब तक उसे अपराधी नहीं माना जाता है |
अनुच्छेद 21 - इसमें प्राण एवं दैहिता स्वतंत्रता है इसी के कारण अधिक धुआ देने वाले वाहन या बिना हेलमेट वाले व्यक्ति का पुलिस चालान काटती है अनुच्छेद 21 में ही निजता का अधिकार पर जोर दिया गया है अब हमारी गोपनीय जानकारी को कोई उजागर नहीं कर सकता |
नोट - अनुच्छेद 20 तथा 21 को आपातकाल के दौरान नहीं रोका जा सकता अतः इसे सबसे शक्तिशाली मूल अधिकार कहते हैं |
अनुच्छेद 21 (क) इसे 6 से 14 वर्ष के बच्चों को नि:शुल्क प्राथमिक शिक्षा का अधिकार है इसे 86 वां संशोधन (2002) द्वारा जोड़ा गया
अनुच्छेद 22 - इसमें तीन प्रकार के स्वतंत्रता दी गई है जो गिरफ़्तारी के संरक्षण (रक्षा) करती है |
व्यक्ति को गिरफ्तार करने से पहले वारंट (कारण) बताना होता है |
24 घंटे के अंदर उसे न्यायालय में सह-शरीर प्रस्तुत किया जाता है इस 24 घंटे में यातायात तथा अवकाश का समय नहीं गिना जाता है |
गिरफ्तार व्यक्ति को अपने पसंद का वकील रखने का अधिकार है |
निवारक
विरोध अधिनियम (Privensive Detertion)
इसकी चर्चा अनुच्छेद 22 के 4 में है इसका उद्देश्य किसी व्यक्ति को सजा देने नहीं बल्कि अपराध करने से रोकना है इस कानून के तहत पुलिस शक के आधार पर किसी भी व्यक्ति को बिना कारण बताए अधिकतम 3 महीने तक गिरफ्तार या नजरबंद कर सकती है |
नजरबंद - किसी व्यक्ति को जब समाज से मिलने नहीं दिया
जाता है तो उसे नजरबंद कहते हैं नजरबंद होटल आवास या जेल कहीं भी हो सकता है |
भारत में प्रमुख निवारण विरोधी अधिनियम
निवारण विरोधी अधिनियम 1950 - यह भारत का पहला निवारण विरोधी अधिनियम इसे 31 दिसंबर 1972 में इसे समाप्त कर दिया गया |
MISA (Mentinance of Internal Security Act) - इसे 1971 में लाया गया किंतु इसका सर्वाधिक दुरूपयोग हुआ जिसके कारण 1978 में इसे समाप्त कर दिया गया |
राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (रासुका) - इसे 1980 में लाया गया यह अभी तक लागू है यह वर्तमान में सबसे खतरनाक अधिनियम है इसके तहत पुलिस एनकाउंटर कर देती है |
TADA (Terioist and Distructive Activity) - इसे 1985 में लाया गया आतंकवादीयो के विरुद्ध इसे लाया गया था दुरुपयोग होने के कारण 23 मई 1995 में इसे समाप्त कर दिया गया |
POTA (Privention of Terririst Act) - यह भी आतंकवादी पर लगाया जाता था इसे 2001 से प्रारंभ तथा 2004 में समाप्त कर दिया गया |
शोषण
के विरुद्ध अधिकार (अनुच्छेद 23 और 24)
अनुच्छेद 23 - बालात श्रम (जबरदस्ती श्रम) तथा बेरोजगारी (बिना वेतन) पर रोक लगाया गया किंतु राष्ट्रीय सुरक्षा के मुद्दे पर बलात श्रम या बेगारी कराया जा सकता है |
अनुच्छेद 24 - अट्ठारह वर्ष से कम उम्र के बच्चों को खतरनाक काम नहीं लगाया जा सकता |
धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार (अनुच्छेद 25 – 28)
अनुच्छेद 25 - अंतः करण की चर्चा अर्थात व्यक्तिगत धार्मिक स्वतंत्रता की चर्चा है इसके तहत सिखों को कृपाण तलवार मुस्लिमों को दाडी हिंदुओं को टीकी रखने की स्वतंत्रता है |
अनुच्छेद 26 - इसमें सामूहिक धार्मिक स्वतंत्रता है इसी के तहत यज्ञ हवन सड़क पर नमाज पढ़ने की अनुमति है |
अनुच्छेद 27 - धार्मिक कार्य के लिए रखा धन पर टैक्स नहीं लगता |
अनुच्छेद 28 - सरकारी धन से चल रहे संस्थान में धार्मिक शिक्षा नहीं दी जाएगी
नोट - संस्कृत एक भाषा है ना कि हिंदू धर्म की धार्मिक शिक्षा इसी प्रकार उर्दू तथा अरबी एक भाषा है ना कि इस्लाम धर्म की शिक्षा अतः सरकारी मदरसा अनुच्छेद 28 का उल्लंघन नहीं है |
संस्कृति
एवं शिक्षा संबंधी अधिकार (अनुच्छेद 29 से 30) अल्पसंख्यक
अनुच्छेद 29 - अल्पसंख्यकों के हितों का संरक्षण
इसमें अल्पसंख्यकों की रक्षा है और कहा गया है कि किसी भी अल्पसंख्यक को इसकी भाषा या संस्कृति के आधार पर किसी संस्था में प्रवेश से नहीं रोक सकते |
अनुच्छेद 30 - अल्पसंख्यकों का शिक्षा संरक्षण
अल्पसंख्यक यदि बहुसंख्यकों के बीच शिक्षा लेने में संकोच कर रहा है तो अल्पसंख्यक अपने पसंद की संस्था को सकते हैं सरकार भी उसे धन देगी |
अनुच्छेद 31 - इसमें पैतृक संपत्ति की चर्चा की गई है जो मूल अधिकार या किंतु 44 वा संविधान संशोधन 1978 द्वारा इसे कानूनी अधिकार बना दिया गया और अनुच्छेद 300 (क) में जोड़ दिया गया |
नोट - अनुच्छेद 19(vi) मैं अर्जित संपत्ति की चर्चा है जबकि 31 में पैतृक संपत्ति की चर्चा है |
मूल अधिकार को हम
से सरकार या जनता कोई नहीं छीन सकता जबकि कानूनी अधिकार को जनता नहीं छीन सकती
किंतु सरकार छीन सकती है इसके लिए सरकार ने भूमि अधिग्रहण विधेयक लाया |
संवैधानिक
उपचारों का अधिकार (अनुच्छेद 32)
अनुच्छेद 32 - संवैधानिक उपचारों का अधिकार अनुच्छेद 32 को मूल अधिकार को मूल अधिकार बनाने वाला मूल अधिकार कहा जाता है क्योंकि इसके द्वारा व्यक्ति हनन के मामले पर सीधे सुप्रीम कोर्ट जा सकता है सुप्रीम कोर्ट पांच प्रकार के रिट/याचिका या समादेश जारी करती है |
1 बंदी
प्रत्यक्षीकरण, 2 प्रतिशोध, 3 परमादेश, 4 उत्प्रेषण, 5 अधिकार पृच्छा |
बंदी प्रत्यक्षीकरण (हवियस कपर्स) - यह व्यक्तिगत स्वतंत्रता का सबसे बड़ा रिट है यह बंदी बनाने वालें अधिकारी को यह आदेश देता है कि उसे 24 घंटे के भीतर से शरीर न्यायालय में प्रस्तुत करें |
परमादेश (मेन्डेमस) - इसका अर्थ होता है हम आदेश देते हैं जब कोई सरकारी कर्मचारी अच्छे से काम नहीं करता है तो उस पर यह जारी किया जाता है |
अधिकार पृच्छा (कोवैरेन्टो) - जब कोई व्यक्ति ऐसे कार्य को करने लगे जिसके लिए वह अधिकृत नहीं है तो उसे रोकने के लिए अधिकार पृच्छा आता है |
अनुच्छेद 352 (राष्ट्रीय
आपात) के दौरान केवल 20 और 21 ही ऐसा अनुच्छेद है जिसे वंचित नहीं किया जा सकता |
प्रतिषेध
(Prohibition) - यह ऊपरी
न्यायालय अपने से निचली न्यायालय पर तब लाती है जब निचली न्यायालय अपने अधिकारों
का उल्लंघन करके फैसला सुना चुकी रहती है |
उत्प्रेषण
(Certiorari) - यह भी ऊपरी
न्यायालय अपने से निचली न्यायालय पर तब लाती है जब निचली न्यायालय अपने अधिकारों
का उल्लंघन करके फैसला सुना चुकी होती है |
नोट - अंबेडकर ने अनुच्छेद 32 को संविधान की आत्मा कहा था |
नोट - किस भाग को संविधान की आत्मा कहते हैं - प्रस्तावना
NOTE -
यह पांच प्रकार के रिट को अनुच्छेद 226 के तहत हाई कोर्ट भी जारी कर सकता है |
अनुच्छेद
33 - राष्ट्रीय सुरक्षा के
हित में संसद सेना मीडिया तथा गुप्तचर के मूल अधिकार को सीमित कर सकती है |
अनुच्छेद
34 - भारत के किसी भी
क्षेत्र में सेना का कानून (Marshal low) लागू किया जा सकता है सेना के न्यायालय
को कोर्ट मार्शल कहते हैं सबसे कठोर मार्शल low AFSPA है | (AXNEI FORCES SPECIAL
POWER ACT)
अनुच्छेद 35 –
भाग-3 में दिए गए मूल अधिकार के लागू होने के विधि की चर्चा |
मूल अधिकार सात श्रेणियों में बांटा गया था
किंतु वर्तमान में 6 श्रेणियां है |
श्रेणी अनुच्छेद
1 समानता का
अधिकार (14-18)
2 स्वतंत्रता का
अधिकार
(19-22)
3 शोषण के
विरुद्ध अधिकार (24-27)
4 धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार (25-28)
5 शिक्षा एवं संस्कृति का अधिकार (29-30)
6 संपत्ति का
अधिकार 31
X
7 संवैधानिक उपचार का अधिकार 32
नोट - अनुच्छेद 14, 20, 21, 21A, 23, 24, (25 – 28)
- भारतीय तथा विदेशियों दोनों के लिए | अनुच्छेद 15, 16, 19, 29, 30 केवल भारतीयों
को मिलता है |
हड़ताल करना तथा चक्का जाम करना मूल अधिकार नहीं
है क्योंकि इससे अन्य व्यक्तियों के मूल अधिकार का हनन हो जाता है |
स्थाई आवास तथा
अनिवार्य रोजगार मूल अधिकार नहीं है |
वोट डालने का
अधिकार राजनीतिक अधिकार है मूल अधिकार नहीं |
मूल अधिकार को
कुछ समय के लिए राष्ट्रपति निलंबित करते हैं |
मूल अधिकार को स्थाई रूप से प्रतिबंधित संसद करती है मूल अधिकार का रक्षक SC/32 तथा HC/226 को कहते हैं |
(भाग 4) नीति निर्देशक
तत्व
इसे भाग - 4 में अनुच्छेद 36 से 51 के बीच रखा गया है इसे आयरलैंड के संविधान से लाया गया है तथा आयरलैंड स्पेन के संविधान से लाया था यह ऐसे तत्व है जो देश के लिए आवश्यक है किंतु संविधान बनते समय सरकार के पास इतने धन तथा संसाधन नहीं थे जो उन्हें उपलब्ध करा सके अतः यह सरकार की इच्छा पर निर्भर है जिस कारण के टी शाह ने कहा है कि नीति निर्देशक तत्व इस चेक के समान है जिसका भुगतान बैंक अपनी इच्छानुसार करता है नीति निर्देशक तत्व का उद्देश्य सामाजिक तथा आर्थिक लोकतंत्र की स्थापना करना है |
अनुच्छेद
36 - परिभाषा
अनुच्छेद
37 - इसे न्यायालय द्वारा
लागू नहीं कराया जा सकता है अर्थात् यह न्यायालय द्वारा प्रवर्तनीय नहीं है या वाद
योग्य नहीं है |
अनुच्छेद
38 - लोक कल्याण की
अभिवृत्ति अर्थात सरकार जनता का कल्याण करेगी जैसे राशन कार्ड (सामाजिक राजनीतिक
न्याय)
अनुच्छेद 39 - समान काम के लिए स्त्री पुरुष को समान वेतन तथा संसाधनों
का उचित वितरण अनुच्छेद 39 (क) निशुल्क विधि (कानूनी) सहायता (42वां संशोधन 1976)
अनुच्छेद
40 - ग्राम पंचायतों का
संगठन
अनुच्छेद
41 - कुछ दशाओं में सरकारी
सहायता (काम शिक्षा प्राप्त करना जैसे वृद्धावस्था पेंशन विधवा पेंशन विकलांग को
साइकिल)
अनुच्छेद 42 - न्याय संगत कार्य की मनोचित्त दशा तथा प्रसूति सहायता उपलब्ध कराना जैसे गर्भवती महिला द्वारा कठोर शारीरिक श्रम न करना
अनुच्छेद
43 - निर्वाह योग मजदूरी
पदार्थ कितना वेतन दिया जाए कि परिवार चला सके (कुटीर उद्योग) ट्रिक - दमन 41 42 43
अनुच्छेद 43 (क) उद्योग प्रबंधन में कारीगरों की
भागीदारी |
अनुच्छेद
44 - समान सिविल संहिता
अर्थात सभी धर्मों के लिए विवाह है एवं तलाक की शर्तें समान रहेगी भले ही विवाह की
रितियां अलग हो |
नोट - अपराध के
कानून को दंड संहिता तथा चुनाव के कानून को आचार संहिता कहते हैं |
अनुच्छेद 45 -- 6 वर्ष से कम आयु के बच्चों के स्वास्थ्य का ध्यान रखना
सरकार की जिम्मेदारी है तथा 6 से 14 वर्ष की आयु के बच्चों को निशुल्क शिक्षा देना
सरकार की जिम्मेदारी है |
नोट - शिक्षा के
अधिनियम को अमूल अधिकार बनाकर 21क में जोड़ दिया है (86 वा संशोधन 2002) अनुच्छेद 46 – SC/ST/OBC के लिए विशेष आरक्षण
अनुच्छेद 47 - सरकार पोस्टिक युक्त आहार उपलब्ध कराएगी तथा नशीली दवाई
एवं शराब पर प्रतिबंध लगाएगी |
अनुच्छेद 48क - पर्यावरण वन तथा वन्य जीव की रक्षा करना सरकार का कर्तव्य
होगा (42वां संशोधन 1976)
अनुच्छेद 49 - राष्ट्रीय स्मारकों की रक्षा करना सरकार का कर्तव्य होगा
|
अनुच्छेद 50 -
कार्यपालिका से न्यायपालिका को अलग करना |
अनुच्छेद
51 - अंतर्राष्ट्रीय शांति
को बढ़ावा देना अंतर्राष्ट्रीय विवादों को मध्यस्था द्वारा सुलझा देना इसी
अनुच्छेद के तहत भारत UNO का सदस्य बना |
नीति
निर्देशक तत्वों का वर्गीकरण
नीति निर्देशक
तत्वों को 3 भाग में बाटते हैं |
गांधीवादी - अनुच्छेद 40, 43क, 46, 47
समाजवादी – 38,
39, 39क, 41, 42, 43
वैदिक या उदारवादी
– 44, 45, 48, 48क, 49, 50, 51
नोट - मिनरमा
मिल मुकदमे में न्यायालय ने कहा कि सरकार नीति निर्देशक तत्व या मूल अधिकार दोनों
पर ध्यान दें | अर्थात संतुलन बनाए रखें | न्यायालय ने कहा कि नीति निर्देशक तत्व
एक लक्ष्य है और इस लक्ष्य पर पहुंचने का साधन मूल अधिकार है |
मूल अधिकार तथा नीति निर्देशक तत्व में अंतर --
मूल अधिकार
1 इसे यूएसए से लिया गया है
2 इसे भाग 3 में रखा गया है
3 यह नैसर्गिक
अधिकार होता है तथा जन्म से ही मिल जाता है
4 यह न्यायालय द्वारा प्रवर्तनीय तथा वाद् योग्य
है
5 यह सरकार की शक्तियों को घटा देता है अर्थात
ऋणात्मक है
6 इसके पीछे
कानूनी मान्यता है
7 यह निलंबित हो
सकता है
8 यह व्यक्ति के
भलाई के लिए है
नीति निदेशक
तत्व
1 इसे आयरलैंड से
लिया गया है
2 इसे भाग 4 में रखा गया है
3 यह नैसर्गिक नहीं होता है तथा सरकार इसे लागू
करती है
4 यह न्यायालय
द्वारा प्रवर्तनीय तथा वाद योग्य नहीं है
5 यह सरकार के अधिकार को बढ़ा देता है अर्थात
धनात्मक है
6 इसके पीछे
राजनीतिक मान्यता है
7 यह निलंबित नहीं हो सकता है
8 यह समाज में भलाई के लिए है
मूल कर्तव्य
इसे 42 वा
संविधान संशोधन 1976 में सरदार स्वर्ण सिंह समिति के सिफारिश पर जोड़ा गया इसे रूस
के संविधान से लिया गया है इसे ने मानने पर कोई दंड का प्रावधान नहीं है इसे भाग 4 (क) में अनुच्छेद 51 (क) के तहत जोड़ा गया मूल
संविधान में मूल कर्तव्य नहीं थे 42वां संशोधन (1976) द्वारा 10 कर्तव्य तथा 86 वा
संशोधन द्वारा एक और मौलिक कर्तव्य जोड़ा गया वर्तमान में मौलिक कर्तव्य की संख्या
11 है |
1 संविधान का
पालन करना तथा इसके आदर्श संस्था (संसद SC,HC) राष्ट्रीय ध्वज राष्ट्रीय प्रतीक
तथा राष्ट्रगान का सम्मान करना |
2 राष्ट्रीय आंदोलन को प्रेरित करने वाले आदर्शों
का पालन करना (नारा)
3 देश के संप्रभुता (दबाव रहित शासन) एकता अखंडता
को बनाए रखना |
4 देश की रक्षा
करना तथा राष्ट्र की सेवा करना |
5 देश के लोगों
में समानता, मेल मिला, तथा भाईचारा बनाए रखना |
6 देश की समृद्धि
तथा गौरवपूर्ण समृद्धि की रक्षा करना |
7 वैज्ञानिक
दृष्टिकोण अपनाना |
8 पर्यावरण वन्य
तथा वन्य जीव की रक्षा करना |
9 सार्वजनिक (सरकारी)
संपत्ति की रक्षा करना |
10 व्यक्तिगत तथा
सामूहिक भलाई के लिए तैयार रहना |
11 6 से 14 वर्ष के बच्चों के अभिभावक का यह
कर्तव्य होगा कि वह अपने बच्चों को प्राथमिक शिक्षा उपलब्ध कराएं (86 वा संशोधन
अधिनियम 2002)
मूल अधिकार 21 (क)
- 6 से 14 वर्ष के बच्चों को प्राथमिक शिक्षा का अधिकार (86 वा संशोधन 2002)
मूल कर्तव्य 51 (क) - 6 से 14 वर्ष के बच्चों के
अभिभावकों उनकी प्राथमिक शिक्षा देने का कर्तव्य नोट - शोषण से कमजोर वर्ग की
रक्षा करना हमारा मूल कर्तव्य नहीं है |
राष्ट्रीय मानवाधिकार संगठन
यह मानवाधिकार की
रक्षा करता है | इसका मुख्यालय दिल्ली
में है इसकी स्थापना 1993 में हुई इसका अध्यक्ष सुप्रीम कोर्ट का रिटायर
मुख्य न्यायाधीश होता है तथा इसमें 7 सदस्य होते हैं |
कार्यपालिका,
विधायिका एंव न्यायपालिका
विधि/विधेयक (बिल)
बनाने की शक्ति विधायिका के पास होती है और उसे लागू करने की शक्ति कार्यपालिका के
पास होती है तथा यदि उसे लागू करने में कोई न्यायिक चुनौती आती है तो उसके
न्यायालय में व्यवस्था करने की शक्ति न्यायपालिका के पास होती है |
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कार्यपालिका विधायिका न्यायपालिका
केंद्र राज्य केंद्र राज्य SC
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*राष्ट्रपति * राज्यपाल संसद विधानमंडल HC
*उपराष्ट्रपति * मुख्यमंत्री लोकसभा
राज्यसभा विधानसभा विधानपरिसद DC
*प्रधानमन्त्री * मंत्रिपरिषद
*मन्त्रीपरिषद्
कार्यपालिका
न्यायपालिका
विधायिका
भाग 5
संघ अनुच्छेद 52 से 151
राष्ट्रपति
अनुच्छेद
52 - राष्ट्रपति का पद - राष्ट्रपति देश का औपचारिक (नाम मात्र के लिए)
प्रमुख होता है औपचारिक प्रमुख के रूप में राष्ट्रपति का पद ब्रिटेन से लिया गया
है |
अनुच्छेद 53 - कार्यपालिका का औपचारिक प्रधान राष्ट्रपति
होता है अर्थात सभी कार्य राष्ट्रपति के हस्ताक्षर के बाद किए जाएंगे कार्यपालिका
का वास्तविक प्रधान प्रधानमंत्री होता है \
अनुच्छेद
54 - राष्ट्रपति का निर्वाचन - इसका निर्वाचन एकल संक्रमणीय आनुपातिक
पद्धति द्वारा अप्रत्यक्ष रूप से गुप्त मतदान होता है |
आनुपातिक
पद्धति - इस पद्धति द्वारा चुनाव
में खड़े सभी उम्मीदवारों को वरीयता क्रम में वोट देना होता है |
एकल संक्रमणीय -
इसके द्वारा सबसे कम मत पाए उम्मीदवार के वोट को लेकर अधिक वोट पाए उम्मीदवार के
वोट में जोड़ दिया जाता है |
प्रथम
चरण की मतगणना - इसमें उम्मीदवार
की पहली वरीयता सूची गिनी जाती है |
द्वितीय चरण - इसमें द्वितीय वरीयता की सूची गिनी जाती है यह प्रथम चरण
में मत बराबर होने के बाद होता है |
नोट -
वीवी गिरी के निर्वाचन के समय द्वितीय चरण की मतगणना हुई थी |
अप्रत्यक्ष
मतदान - राष्ट्रपति के
निर्वाचन में जनता भाग नहीं लेती बल्कि जनता द्वारा चुने गए प्रतिनिधि भाग लेते
हैं |
राष्ट्रपति
का निर्वाचन मंडल - राष्ट्रपति का
निर्वाचन मंडल में लोक सभा, राज्य सभा तथा सभी राज्य (29 + 2) (दिल्ली + पांडिचेरी)
के निर्वाचित सदस्य भाग लेते हैं \
* विधान परिषद
राज्यसभा के 12 मनोनीत सदस्य तथा लोकसभा के दो एंग्लो इंडियन
राष्ट्रपति के निर्वाचन में भाग नहीं लेते हैं |
* मुख्यमंत्री जब
विधान परिषद का सदस्य होगा तो वह राष्ट्रपति के निर्वाचन में भाग नहीं लेगा |
* 69 वां संशोधन 1990 द्वारा दिल्ली तथा पांडिचेरी में विधानसभा का
गठन किया गया |
* 70 वा संशोधन 1990 द्वारा राष्ट्रपति के निर्वाचन मंडल में
दिल्ली तथा पांडिचेरी को राष्ट्रपति के निर्वाचन मंडल में शामिल किया गया |
संसद विधानमंडल
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R. S. 245 V. P. 7X भाग नही लेते है
L. S. 545 V. S. 29
क्योंकि पुरे राज्यों में V. P. नही है इसलिए
*1 MLA के वोट की VALUE –
1 MLA =
राज्य की जनसंख्या / राज्य के MLA X 1000
*1 MP के वोट की वैल्यू –
1 MP =
कुल MLA का वोट / कुल संसद की संख्या
नोट - भारत में 29 राज्य के वोट मिलाने पर
एमएलए का कुल वोट 5 49 495 वोट आता है जबकि एमपी का कुल वोट 708 के लगभग आता है |
* इस प्रकार
राष्ट्रपति के चुनाव में कुल 11,000,00 वोट के लगभग
पढ़ते हैं |
राष्ट्रपति
की जमानत राशि - चुनाव लड़ने से
पूर्व राष्ट्रपति को ₹15000 रुपया जमानत के रूप में आर.बी.आई. के पास रखना होता है |
यदि राष्ट्रपति
को 1/6 भाग से कम वोट मिलेगा तो राष्ट्रपति की जमानत
राशि जप्त हो जाएगी |
इसे जमानत जप्त हो ना कहते हैं यह अपमान की
स्थिति है |
अनुच्छेद
55 - इसको राष्ट्रपति का कोटा कहते हैं जमानत जप्त होने के बाद
भी प्रत्याशी जीत सकता है किंतु कोटा कम से कम वोट पाने पर जीते हुए प्रत्याशी को
भी हटा दिया जाता है |
कुल = कुल वोट / कुल
प्रत्याशी +1 +1
कुल वोट = 60
जमानत = 60 / 6 = 10
A,
B, C, D,
E, F, G,
H, I, J,
K, L, M
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कोटा = 60 / 13 + 1 +1 = 60 / 14 +1
= 74 / 14 =6 लगभग
अनुच्छेद
56 - इसमें राष्ट्रपति के कार्यकाल के बारे में बताया गया है
राष्ट्रपति का कार्यकाल 5 वर्ष का होता है यदि राष्ट्रपति का पद 5 वर्ष से पहले ही खाली हो जाता है तो नया राष्ट्रपति 5 वर्ष के लिए आता है ना कि बचे हुए कार्यकाल के लिए |
नोट -
अमेरिका में राष्ट्रपति का चुनाव 4
वर्षों के लिए होता है |
अनुच्छेद
57 - एक ही राष्ट्रपति दोबारा निर्वाचित हो सकते हैं अब तक
डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद ही दोबारा निर्वाचित हुए हैं |
अनुच्छेद 58 - योग्यता
1
वह भारत का
नागरिक हो
2
आयु 35 वर्ष से अधिक हो
3
लोकसभा के सदस्य बनने की योग्यता हो
4
50 प्रस्ताव तथा 50 अनुमोदक हो
अनुच्छेद 59 दशाऐ / शर्तें –
1 पागल या
दिवालीया न हो
2 लाभ के पद पर ना हो
3 संसद या
विधानमंडल मैं किसी का भी सदस्य ने हो |
यदि कोई सदस्य
राष्ट्रपति निर्वाचित हो गया तो उसे शपथ लेने से पूर्व अपने सदन की सदस्यता त्याग
नहीं पड़ती है |
नोट - सरकारी नौकरी लाभ का पद कहलाता है सांसद
मंत्री विधायक लाभ के पद नहीं है यह जनता के सेवक है |
अनुच्छेद
60 - राष्ट्रपति को शपथ दिलाने का कार्य सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य
न्यायाधीश करता है इसके अनुपस्थिति में सुप्रीम कोर्ट के सेस 30 न्यायाधीशों में से वरिष्ठ न्यायाधीश दिलाएंगे |
न्यायिक
शक्ति - अनुच्छेद 72 के अंतर्गत राष्ट्रपति की क्षमा शक्तियां है
राष्ट्रपति क्षमा करने से पूर्व गृह मंत्रालय की सलाह लेता है यह पांच प्रकार की
सजा को माफ कर सकता है |
क्षमा
- जब राष्ट्रपति किसी भी
सजा को पूरी तरह माफ करता है तो उसे क्षमा कहते हैं |
लघु
करण - इसमें राष्ट्रपति सजा की
प्रकृति को बदलते हैं किंतु समय नहीं घटाते हैं |
EX. - फांसी की सजा को आजीवन कारावास 10 साल कठोर कारावास को 10 साल साधारण कारावास|
प्रतिहार
- इसमें राष्ट्रपति समय
घटाते हैं किंतु प्रकृति नहीं |
EX. - 10 साल कठोर कारावास को 5 साल कारावास
*इसका प्रयोग
फांसी की सजा पर नहीं हो सकता है |
विराम
- किसी कैदी का स्वास्थ्य
उचित नहीं है तो उसकी सजा पर राष्ट्रपति कुछ समय के लिए रोक लगा देते हैं |
प्रतिलंबन
- राष्ट्रपति जब फांसी की
सजा को कुछ समय के लिए रोक लगाते हैं तो उसे प्रति लंबन कहते हैं यह इसलिए लगाया
जाता है कि कैदी दया याचिका अपील कर सकें |
नोट – राष्ट्रपति सिविल कोर्ट तथा सेना की कोर्ट
दोनों की सजा माफ कर देते हैं जबकि राज्यपाल केवल सिविल कोर्ट की सजा माफ कर सकते
हैं (मौत की सजा राज्यपाल छोड़कर)
राज्यपाल भी सजा माफ कर सकता है किंतु फांसी एवं
सेना की सजा को माफ नहीं कर सकता |
अमेरिकी
राष्ट्रपति दी सेना की सजा को माफ नहीं कर सकता है |
सैन्य
शक्ति - यह तीनों सेना का प्रधान
होता है अतः यह किसी देश में युद्ध/विराम की घोषणा करता है|
राजनीतिक
शक्ति - यह भारत के राजदूत को
विदेश में भेजता है तथा विदेशी राजदूत को भारत में आने की अनुमति देता है विदेश
जाने वाले मंत्री राष्ट्रपति से अनुमति लेकर जाते हैं |
राष्ट्रपति
की आपातकालीन शक्तियां -
राष्ट्रीय
आपात अनुच्छेद 352 - जब किसी विदेशी आक्रमण हो जाए या सशस्त्र विद्रोह हो जाए
तो मंत्रिमंडल की सिफारिश पर राष्ट्रपति राष्ट्रीय आपात की घोषणा करते हैं |
घोषणा के 30 दिन के अंदर संसद के दोनों सदनों द्वारा राष्ट्रीय आपात का अनुमोदन करना आवश्यक
है यदि राज्यसभा कर दिया तथा लोकसभा भंग है तो नई लोक सभा 30 दिन के भीतर अनुमोदन करेगी|
दोनों सदनों में
अनुमोदन मिलने के बाद आपात 6 माह तक लागू अनुमोदन अनंत काल तक बढ़ाया जा
सकता है |
यदि राष्ट्रपति
बिना मंत्रिमंडल की सिफारिश के आपातकाल लागू कर देता है तो इसकी चुनौती सुप्रीम
कोर्ट में दी जा सकती है |
राष्ट्रीय
आपात का प्रभाव
1 इसमें मूल
अधिकार स्थगित कर दिया जाता है |
2 देश का संघीय
ढांचा प्रभावित हो जाता है |
3 अनुच्छेद 352 जब लागू करता है तो अनुच्छेद 358 स्वत: लागू हो जाता है दी गई विभिन्न प्रकार
की स्वतंत्रता को स्थगित कर देता है |
4 अनुच्छेद 352
आपातकाल के दौरान राष्ट्रपति को यह अधिकार देता है कि वह अनुच्छेद 20 और 21 को छोड़कर किसी भी मूल अधिकार को स्थगित कर
सकता है |
5
राज्य सरकार शक्ति
विहीन हो जाती है |
6
संसद राज्य सूची
के विषय में कानून बना सकता है किंतु यह प्रभाव केवल 1 साल तक रहता है|
नोट - अनुच्छेद 352 में
पहली बार मंत्रिमंडल पर चर्चा हुआ है |
*अब तक तीन बार
राष्ट्रीय आपातकाल लगाया गया है |
1 1962 चीन युद्ध
2 1971 बांग्लादेश संकट
3 1975 आंतरिक अशांति
इसमें लोकसभा का
कार्यकाल 1 वर्ष के लिए बढ़ा दिया जाता है |
राजकीय आपात या
राष्ट्रीय शासन –
यह तब तक लाया
जाता है जब राज्य का संवैधानिक ढांचा विफल हो जाए अनुच्छेद 356 में कहा गया है कि
प्रत्येक विधानसभा संविधान के अनुरूप शासन करेगी |
अर्थात बहुमत की
सरकार द्वारा ही शासन होगा अनुच्छेद 365 में कहा गया है कि राज्य
केंद्र सरकारों के दिशा निर्देशों पर कार्य करेगी |
यदि 356 या 365 का कोई राज्य उल्लंघन करेगा तो राज्यपाल की सूचना पर है मंत्रिमंडल की
सिफारिश पर उस राज्य में राष्ट्रपति आपात लागू कर दिया जाता है |
राजकीय आपात का अनुमोदन 60 दिन के भीतर करना अनिवार्य है |
यदि राज्यसभा ने
कर दिया है तथा लोकसभा अनुमोदन की पूर्व भंग है तो नहीं लोकसभा 30 दिन के भीतर करेगी |
संसद के दोनों
सदनों से अनुमोदन मिलने के बाद 6 माह तक लागू करेंगे |
छह छह माह करके
इसे अधिकतम 3 वर्ष तक लागू किया जाता है |
अपवाद के रूप में जम्मू और कश्मीर में राष्ट्रीय आपात 3 वर्ष से अधिक तक रहेगी |
पहली बार राष्ट्रीय आपात पंजाब (PEP) 1952 में लागू हुआ |
राष्ट्रीय
आपात का प्रभाव –
1 राज्य की सारी
शक्तियां राज्यपाल के हाथ में चली जाती है |
2 मुख्यमंत्री
शक्ति विहीन |
3 राज्य की
विधियां शक्तियां संसद के पास चली जाती है |
4 राज्य का बजट
संसद में प्रस्तुत होने लगता है |
नोट - राष्ट्रीय
आपात के दौरान हाई कोर्ट में कार्य प्रभावित नहीं होते हैं |
वित्तीय
आपात अनुच्छेद 360 –
इसे यूएसए के
संविधान से लाया गया है इसे तब लाया जाता है जब देश में वित्तीय स्थिति खराब हो |
इसे मंत्रिमंडल
की सलाह पर राष्ट्रपति लाते हैं |
संसद के दोनों
सदनों द्वारा 60 दिनों के अंदर अनुमोदन करना अनिवार्य है |
यदि राज्यसभा ने
अनुमोदन कर दिया तथा लोकसभा भंग है तो नई लोकसभा 30 दिनों मैं अनुमोदित
करेगी |
एक बार अनुमोदन
मिलने के बाद जब तक संसद नहीं हटाती तो यह नहीं हटता है |
यह अभी तक लागू
नहीं है |
प्रभाव
- राष्ट्रपति के वेतन को
छोड़कर शेष सरकारी कर्मचारी के वेतन काट लिया जाता है |
सरकारी खर्च में
कटौती की जाती है |
टैक्स बढ़ा दिया
जाता है |
राष्ट्रपति
का विवेकाधिकार शक्ति - इस शक्ति का
प्रयोग राष्ट्रपति अपनी इच्छा अनुसार करते हैं इसका प्रयोग लोकसभा के त्रिशंकु
होने पर किया जाता है अर्थात किसी को बहुमत में मिले तो करते हैं |
जब लोकसभा में
किसी को बहुमत नहीं मिलता है तो राष्ट्रपति किसी भी दल के नेता को प्रधानमंत्री
घोषित कर देते हैं और 30 दिन के भीतर बहुमत सिद्ध करने को कहते हैं यदि
उसने 30 दिन के भीतर बहुमत सिद्ध कर दिया तो वह प्रधानमंत्री होगा
अन्यथा दोबारा चुनाव होगा |
राष्ट्रपति
की वीटो शक्ति - विधेयक को रोकने
की शक्ति को विटो शक्ति कहते हैं यह तीन प्रकार की होती है |
1 अत्यंत
कारी विटो - राष्ट्रपति जब विधेयक को
पूरी तरह रद्द कर देते हैं तो उसे अत्यंत कारी विटो कहते हैं अब यह समाप्त हो चुका
है |
2 नीलबंकारी
- राष्ट्रपति जब
पुनर्विचार के लिए लौटाते हैं |
3
POCKET/जेब वीटो - जब राष्ट्रपति
किसी भी विधेयक पर ने अपना हस्ताक्षर करें नहीं उसे पुनर्विचार के लिए लौटाऐ बल्कि
उससे अपने ही पास रख ले तो उसे पॉकेट वीटो कहते हैं |
डाक
संशोधन विधेयक 1986 पर राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह ने
जेब वीटो का उपयोग किया था |
विशेषाधिकार
शक्ति - राष्ट्रपति पर दीवानी
मुकदमा चलाया जा सकता है किंतु फौजदारी मुकदमा कार्यकाल के दौरान नहीं चलाया जा
सकता है |
कार्यकाल समाप्ति
के बाद चलाया जाएगा अर्थात यह अनुच्छेद 14 का उल्लंघन है |
राष्ट्रपति किसी
भी केंद्रीय विश्वविद्यालय के महाकुलधिपति होते हैं |
अनुच्छेद
61 - राष्ट्रपति का महाभियोग - महाभियोग शब्द केवल राष्ट्रपति के लिए प्रयोग
हो सकता है यह प्रक्रिया यू.एस.ए. के संविधान से लिया गया है अब तक किसी
राष्ट्रपति पर महाभियोग नहीं लाया गया है |
राष्ट्रपति पर
महाभियोग किसी भी सदन से प्रारंभ हो सकता है जिस सदन महाभियोग प्रारंभ करना है उसे
सदन का1/4 (25%) सदस्य अनुमोदित करेंगे अनुमोदन मिलने के बाद वह सदन 2/3 बहुमत से
महाभियोग को पारित करेंगे |
जब एक सदन
महाभियोग पारित कर देता है तो दूसरे सदन मैं भेजने से 14 दिन पूर्व इसकी सूचना राष्ट्रपति को दी जाती है |
अनुच्छेद
63 - राष्ट्रपति के पद की चर्चा है जो यू.एस.ए. के संविधान से
ली गई है |
अनुच्छेद
64 - राष्ट्रपति ही राज्यसभा का सभापति होता है किंतु वह
राज्यसभा का सदस्य नहीं होता है उपराष्ट्रपति का वेतन सभापति होने के नाते दिया
जाता है |
अनुच्छेद
65 - राष्ट्रपति के अनुपस्थिति मैं उपराष्ट्रपति ही कार्यवाहक
राष्ट्रपति का कार्य करता है इस दौरान वे राष्ट्रपति के सभी शक्तियों का प्रयोग
करेगा किंतु इस दौरान वे राष्ट्रपति का कार्य नहीं करेगा |
अनुच्छेद
66 - उपराष्ट्रपति के निर्वाचन की चर्चा है जो एकल संक्रमणीय
आनुपातिक पद्धति द्वारा होता है उपराष्ट्रपति के निर्वाचन में संसद के दोनों सदनों
के सभी सदस्य भाग लेते हैं चाहे वह मनोनीत हो या निर्वाचित |
राज्य की विधान
मंडल उपराष्ट्रपति के निर्वाचन में भाग नहीं लेते हैं उपराष्ट्रपति के निर्वाचन
में खड़े होने के लिए योग्यता
1 वह भारत का
नागरिक हो
2 पागल या
दिवालीया न हो
3 आयु 35 वर्ष से अधिक हो
4 लाभ के पद पर
ने हो
5
20 प्रस्तावक तथा 20 अनुमोदक हो
6
15000 रुपया जमानत राशि हो
7 राज्यसभा का
सदस्य बनने की योग्यता
अनुच्छेद 67 राष्ट्रपति का कार्यकाल सामान्यत: 5 वर्ष का होता है किंतु उसके उत्तराधिकारी का निर्वाचन नहीं हुआ है तो है तब तक
अपने पद पर रहेगा जब तक उसका उत्तराधिकारी निर्वाचित नहीं हो सके |
5 वर्ष से पहले भी महाभियोग
द्वारा हटाया जा सकता है |
उपराष्ट्रपति पर महाभियोग -
यह राज्यसभा का
सभापति होता है इसी कारण उपराष्ट्रपति पर महाभियोग राज्यसभा से ही प्रारंभ होगा|
महाभियोग
- प्रक्रिया प्रारंभ करने
के लिए ¼(25%) मत की आवश्यकता है जब राज्यसभा से पारित
कर देते हैं तो लोकसभा में भेजने से 14 दिनों पूर्व इसकी सूचना
उपराष्ट्रपति को दी जाती है ताकि वह अपनी बात रख सकें यदि लोकसभा का 2/3(66%) मत
से पारित कर देती है तो उसे हटा दिया जाता है |
अब तक किसी
राष्ट्रपति या उप राष्ट्रपति पर महाभियोग नहीं लगा है |
अनुच्छेद
68 - उपराष्ट्रपति के चुनाव को यथाशीघ्र कराने की चर्चा है अतः
इसमें निश्चित समय नहीं दिया गया है |
अनुच्छेद
69 - उपराष्ट्रपति को शपथ दिलाने का कार्य राष्ट्रपति करता है |
अनुच्छेद
70 - वैसा आकस्मिक स्थिति जिसकी चर्चा संविधान में नहीं है और
उसी कारण राष्ट्रपति का पद खाली है तो उस स्थिति में राष्ट्रपति ही कार्यवाहक उपराष्ट्रपति
का कार्य करेगा |
EX. - खराब
स्वास्थ्य अपहरण इत्यादि |
अनुच्छेद
71 - राष्ट्रपति व उपराष्ट्रपति के विवादों को सुप्रीम कोर्ट
में सुलझाया जाएगा |
अनुच्छेद
72 - राष्ट्रपति के विभिन्न प्रकार की समाधान शक्तियां है |
अनुच्छेद
73 - संघ की कार्यपालिका कार्यप्रणाली को आसान बनाने के लिए
राष्ट्रपति कानून बनाएगा |
अनुच्छेद
74 - राष्ट्रपति को सलाह देने के लिए एक मंत्रिपरिषद होगा जिसका
अध्यक्ष प्रधानमंत्री होगा अर्थात मंत्रीपरिषद प्रधानमंत्री के अधीन होता है |
अनुच्छेद
75 - मंत्रियों के बारे में अन्य उपबंध (व्यवस्था) अर्थात
मंत्रियों की नियुक्ति प्रधानमंत्री के सलाह पर राष्ट्रपति करते हैं |
1861 से भारत में लार्ड केनिन ने विभागीय प्रणाली (पोर्टफोलियो)
लागू कर दिया इसके तहत भारत के विभिन्न कार्यों को अलग-अलग विभाग में बांट दिया
इसे मंत्रियों को सौंप दिया |
मंत्री परिषद (COUNSIL OF MINISTER)
इसमें चार प्रकार
के मंत्री रहते हैं |
1
कैबिनेट
मंत्री - यह किसी भी विभाग का सबसे
बड़ा मंत्री होता है यह अपने विभाग के सभी फैसले लेने के लिए स्वतंत्र है |
2
राज्यमंत्री
- प्रत्येक विभाग में एक
राज्यमंत्री होता है यह कैबिनेट मंत्री का सहायक है यह हर एक राज्य में नहीं होता
है यह हर एक विभाग में होता है
3
राज्यमंत्री
(स्वतंत्र परभार) - जिस विभाग का
कैबिनेट मंत्री किसी कारण से अनुपस्थित रहता है तो उस विभाग के राज्यमंत्री को
स्वतंत्र प्रभार कहा जाता है |
4
उपमंत्री - यह सबसे छोटे स्तर का मंत्री है यह राज्यमंत्री की सहायता
करता है |
नोट - जब किसी विभाग
को दूसरे विभाग के कैबिनेट मंत्री को सौंप दिया जाता है तो उसे अतिरिक्त प्रभार
कहते हैं |
मंत्रिमंडल GROUP of MINISTER) -
इसमें केवल उच्च श्रेणी के मंत्री ही
भाग लेते हैं इसमें कैबिनेट मंत्री तथा राज्य मंत्री स्वतंत्र प्रभार आते हैं |
मंत्रिमंडल शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग अनुच्छेद 352 में है |
नोट - प्रधानमंत्री
मंत्रीमंडल तथा मंत्री परिषद दोनों का अध्यक्ष होता है |
सुपर कैबिनेट - अर्थशास्त्री “के संथानन” ने योजना आयोग को सुपर
कैबिनेट कहा जाता है |
किचेन
कैबिनेट - प्रधानमंत्री के सगे संबंधियों को किचेन केबिनेट कहा जाता है |
मंत्री परिषद में
विभाग वितरण प्रधानमंत्री के इच्छा अनुसार होती है |
यह लोकसभा के
प्रति उत्तरदायी होता है जिस कारण मंत्री किसी भी सदन का हो सकता है वह लोकसभा में
बैठ सकता है किंतु मतदान के समय वह अपने सदन में चला जाता है |
मंत्री व्यक्तिगत
रूप से राष्ट्रपति के प्रति उत्तरदायी होता है |
मंत्री परिषद का
अध्यक्ष प्रधानमंत्री होता है अतः प्रधानमंत्री की मृत्यु त्यागपत्र से मंत्री
परिषद भंग होता है और जब नया प्रधानमंत्री पुनः मंत्री परिषद का गठन करता है इस
स्थिति में लोकसभा भंग नहीं होती है अर्थात दोबारा चुनाव नहीं होगा |
दोबारा चुनाव तभी होगा जब बहुमत 273 सीट कम पड़ जाएगी |
बहुमत सिद्ध करने
के लिए गठबंधन भी किया जाता है |
B.J.P. के
नेतृत्व में बनाया गया गठबंधन राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग NDA) है |
सहायक दल :--
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शिवसेना (महाराष्ट्र)
अकाली दल (पंजाब)
JDU (बिहार)
लोजपा (बिहार)
NDA 1 – 2014 –
19
NDA 2 – 2019 –
24
कांग्रेस के
नेतृत्व में बनाया गया गठबंधन संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन प्रसंग (U.P.A.) कहलाता है
|
UPA 1 - 2004 –
09
UPA 2 – 2009 –
2019
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कांग्रेस
B.S.P. (U.P.)
S.P. (U.P.)
R.J.D. (BIHAR)
U.P.A. या NDA के
अलावा बनाया गया गठबंधन तीसरा मोर्चा है |
प्रधानमंत्री
की शक्तियां - यह योजना आयोग
राष्ट्रीय विकास परिषद, राष्ट्रीय एकता परिषद, मंत्रिमंडल तथा मंत्री परिषद
राष्ट्रीय एकता परिषद मंत्रिमंडल तथा मंत्री परिषद का अध्यक्ष होता है |
प्रधानमंत्री CAG
महान्यायवादी मंत्री आदि के नियुक्ति संबंधी सिफारिश राष्ट्रपति को भेजता है |
“मोरले नामक
विद्वान ने प्रधानमंत्री को समकक्षों मैं सबसे प्रथम कहां है|”
म्युर नामक विद्वान ने राज्य रूपी जहाज को
स्टीयरिंग व्हील मंत्रिमंडल को कहा जाता है |
नोट - बिना संसद के सदस्य बने ही कोई व्यक्ति 6 माह तक प्रधानमंत्री या मंत्री रह सकता है किंतु 6 माह के भीतर उसे संसद की सदस्यता लेनी होगी |
“उप
प्रधानमंत्री”
इसके बारे में
संविधान में कोई स्पष्ट चर्चा नहीं है यह राजनीतिक उद्देश्य के लिए बनाया गया पद
है |
जब प्रधानमंत्री देश के बाहर रहते हैं तो उप
प्रधानमंत्री देश पर नियंत्रण रखते हैं |
जब उप
प्रधानमंत्री नहीं रहता है तो गृहमंत्री देश पर नियंत्रण रखता है |
अब तक सात उप
प्रधानमंत्री बने हैं |
1 सरदार पटेल
2 मोरारजी देसाई
3
चौधरी चरण सिंह
4
जगजीवन राम
5
B B चौहान
6
देवीलाल
7
लालकृष्ण आडवाणी
महान्यायवादी (ATTORNY GENERAL) :--इसकी चर्चा अनुच्छेद 76 में है यह केंद्र सरकार
का प्रथम विधि (अधिकारी कानूनी सलाहकार) होता है यह संसद का सदस्य नहीं होता है
किंतु कार्यवाही में भाग लेता है यह मतदान नहीं कर सकता है |
इसका पूर्ण कार्य काल 5 वर्षों के लिए नहीं होता है बल्कि यह राष्ट्रपति
के प्रसादपर्यंत (इच्छानुसार) होता है जिस कारण यह निजी व्यक्ति का भी मुकदमा लड़
सकता है |
इन्हें वेतन संचित निधि से नहीं मिलता है बल्कि प्रधानमंत्री को से दिया जाता
है केंद्र सरकार पर किसी भी प्रकार के मुकदमे को महान्यायवादी लड़ता है यह मुकदमे
को भारत के किसी भी न्यायालय में लड़ सकता है इसकी योग्यता सर्वोच्च न्यायालय के
जज के बराबर होती है |
SOTICITY GENERAL
इसे सहायता देता है S.G. कोADITIONAL SOTICITY GENERAL सहायता देता है वर्तमान
महान्यायवादी KK वेणुगोपाल है |
अनुच्छेद
77 - केंद्र सरकार के कार्यों की संचालन की चर्चा है जो विभिन्न
मंत्रालय द्वारा संपन्न होता है राष्ट्रपति इसके कार्यों को आसान बनाने के लिए
कानून बना सकते हैं |
अनुच्छेद
78 - प्रधानमंत्री का यह कर्तव्य होगा कि संसद के कार्यवाही की
जानकारी राष्ट्रपति को दे +AG
अनुच्छेद 78 – संसद - संसद भवन का निर्माण एडविन लुटियंस
वेकर्स ने किया | पार्लियामेंट शब्द फ्रांस से लिया गया जबकि संसद की जननी U.K. को
कहते हैं |
संसद के तीन अंग
हैं लोकसभा राज्यसभा तथा राष्ट्रपति |
संसद के दो सदन
है लोकसभा और राज्यसभा |
संसद किसी
अंतरराष्ट्रीय संधि या समझौता को किसी भी राज्य में लागू कर सकता है बिना उस राज्य
के अनुमति के |
संसद के बीच का
भाग CENTRAL HALL कहलाता है विदेशी अतिथि CENTRAL HALL में ही भाषण देते हैं |
संविधान का
निर्माण CENTRAL HALL मैं ही बैठकर किया हुआ है इसमें 1000 तक आदमी बैठ सकते हैं |
यह 1927 में बनना शुरू हुआ |
राज्यसभा
इसका विघटन नहीं
हो सकता है जिस कारण इसे स्थाई या उच्च/सदन कहते हैं |
इसके निर्वाचन
में जनता भाग नहीं लेती है अतः इसे अप्रत्यक्ष मतदान कहा जाता है |
इसमें मंत्रिमंडल
नहीं बैठते हैं और ना ही इसके बहुमत के आधार पर प्रधानमंत्री बनता है अतः इसे
द्वितीय सदन भी कहते हैं |
किसी भी राज्य का
व्यक्ति किसी भी राज्य से राज्यसभा का चुनाव लड़ सकता है |
EX. - मनमोहन
सिंह पंजाब के थे जबकि वह हैं असम से चुनाव लड़े थे |
राज्य सभा की
चर्चा अनुच्छेद 30 में है जबकि अनुच्छेद 80(क) के तहत राष्ट्रपति इसमें 12 सदस्यों को मनोनयन कर देते हैं जो विज्ञान कला
साहित्य के क्षेत्र से अच्छे हो |
राज्यसभा के
सदस्यों का कार्यकाल 6 वर्ष का होता है किंतु इसके सभी सदस्यों का
निर्वाचन एक ही बार में नहीं होता है बल्कि प्रत्येक 2 वर्ष बाद 1/3 सदस्यों का निर्वाचन होता है |
R.S. = 6 वर्ष (
2 वर्ष पर चुनाव )
![]()
2010
2 वर्ष 2012 2 वर्ष
2014
![]()
2016
2 वर्ष 2018 2 वर्ष
2020
राज्य सभा में
अधिकतम 250 सदस्य होते हैं किंतु P.O.K. पर पाकिस्तान के कब्जे के कारण वर्तमान
समय में इनकी संख्या 245 है \
राज्य में
निर्वाचित सदस्यों की संख्या 245-12(235) है |
राज्यसभा के
सदस्य बनने की योग्यता –
1
भारत का नागरिक हो
|
2 पागल दिवालिया ने हो |
3 किसी लाभ के पद
पर न हो |
4 कम से कम 30 वर्ष आयु का हो |
राज्यसभा को शिक्षित तथा वृद्धों का सदन कहा
जाता है |
राज्य सभा की पहली बैठक 3 अप्रेल 1952 को हुई थी
उस समय इसका नाम COUNCIL of STATE था 3 अगस्त 1954 को इसका नाम राज्यसभा कर दिया |
राज्यसभा की विशिष्ट
शक्तियां –
उपराष्ट्रपति पर
है महाभियोग राज्यसभा से ही प्रारंभ होता है जब लोकसभा भंग रहती है तो आपात का
अनुमोदन राज्यसभा से ही होता है |
अनुच्छेद 249 के
तहत राज्य सूची के विषय में कानून बनाने का अधिकार राज्यसभा लोकसभा को देती है
दोनों मिलकर 1 वर्ष के लिए कानून बना देता है |
अनुच्छेद 312 के तहत नई अखिल भारतीय सेवा के सर्जन (निर्माण) का अधिकार राज्यसभा लोकसभा को
देती है दोनों मिलकर इस सेवा का सृजन करते हैं |
EX. - भारतीय
वन्य सेवा |
राज्यसभा
की कमजोरी –
1 बजट लोकसभा में
प्रस्तुत होता है राज्यसभा 14 दिन से अधिक नहीं रोक सकती है |
2
मंत्रिपरिषद
राज्यसभा के प्रति उत्तरदाई नहीं होता है |
3
यदि विधेयक पर
विवाद हो जाए तो संयुक्त अधिवेशन में लोकसभा की संख्या बल अधिक होती है |
4
जिस कारण विधेयक
लोकसभा की इच्छा अनुसार पारित हो जाता है |
लोकसभा (अनुच्छेद
80)
इसका 5 वर्ष से पूर्व भी विघटन हो सकता है जिस कारण से स्थाई या निम्न सदन कहते हैं |
इसके बहुमत के
आधार पर प्रधानमंत्री बनते हैं तथा मंत्री परिषद लोकसभा में बैठता है इसे प्रथम
सदन कहते हैं |
इसका चुनाव जनता
सीधे करती है अतः इसे प्रत्येक सदन कहते हैं इसे जनता का सदन भी कहते हैं |
भारत का नागरिक
किसी भी राज्य से लोकसभा का चुनाव लड़ सकता है |
एक ही व्यक्ति 2 लोकसभा सीटों से चुनाव लड़ सकता है किंतु यदि दोनों से जीत गया तो 1 सीट से त्यागपत्र देना होता है |
EX. - नरेंद्र
मोदी = बड़ोदरा (त्याग) बनारस
नोट - जब एक सीट से त्यागपत्र देगा तो खाली सीट पर
कराया गया चुनाव उपचुनाव कहलाता है जो बचे हुए कार्यकाल के लिए होता है तथा 6 माह के भीतर कराना होगा |
लोकसभा का सदस्य
बनने के लिए योग्यता –
1 भारत का नागरिक
हो
2 पागल, दिवालिया
एवं लाभ के पद पर न हो
3 आयु 25 वर्ष हो अतः लोक सभा को युवाओं का सदन कहते हैं |
लोक सभा की पहली
बैठक 1952 में हुई उस समय इसका नाम हाउस of पीपल था 1954 में इसका नाम बदलकर लोकसभा किया गया |
नोट - संविधान संशोधन के मुद्दे पर लोकसभा तथा
राज्यसभा दोनों की शक्तियां समान होती है |
राज्यसभा लोकसभा
विघटित नहीं होता है विघटित होता है
स्थाई / उच्च सदन अस्थाई / निम्न सदन
अप्रत्यक्ष प्रत्यक्ष
शिक्षितों का सदन जनता का सदन
वृद्धों का सदन युवाओं का सदन
द्वितीय सदन प्रथम सदन
मंत्री नहीं बैठते हैं मंत्री बैठते हैं
12 सदस्य मनोनीत 2 सदस्य मनोनीत |
अनुच्छेद
82 - प्रत्येक गणना के बाद सीटों का समायोजन 1000000 जनगणना पर एक सांसद की व्यवस्था है |
वर्तमान सीटों की
संस्था 1971 की जनगणना पर आधारित है |
2002 में 84 वें संशोधन में यह है
व्यवस्था किया गया है कि लोकसभा तथा राज्यसभा की सीटें 2026 तक नहीं बदली जाएगी जब यह बदली जाएगी तो 2001 की जनगणना पर
आधारित होगी |
यह व्यवस्था
कुलदीप सिंह समिति द्वारा की गई थी |
अनुच्छेद
83 - सदन की अवधि की चर्चा है
राज्यसभा स्थाई सदन है जबकि लोकसभा की अवधि 5 वर्ष है |
अनुच्छेद 84 - संसद की
योग्यता है |
1 भारत के नागरिक
हो
2 पागल दिवालिया
तथा लाभ के पद पर न हो |
3 लोकसभा के लिए 25 वर्ष तथा राज्यसभा के लिए 30 वर्ष आयु हो |
अनुच्छेद
85 - इसमें सत्र के लिए आहूत (बुलाना) तथा सत्रावसान (सत्र खत्म)
की चर्चा है |
सत्र
का आहूत :- राष्ट्रपति जब विधेयक
बनाने के लिए लोकसभा तथा राज्यसभा के सदस्यों को बुलाते हैं तो इसे सत्र आहूत कहते
हैं |
सत्रावसान
:- यह दोनों सदन कानून बना
लेते हैं तो राष्ट्रपति सत्र को समाप्त करके उन्हें वापस अपने क्षेत्र में भेज
देता है \
कार्यवाही
स्थगित :- अनुशासनहीनता तथा
शोर-शराबे के कारण सदन की कार्यवाही कुछ घंटा या कुछ दिनों के लिए स्थगित लोकसभा
के अध्यक्ष तथा राज्यसभा के सभापति करते हैं |
विघटन :- राज्यसभा का विघटन नहीं होता है बल्कि लोकसभा
का विघटन होता है लोकसभा का समय से पूर्व (5 वर्ष) समाप्त हो जाना
विघटन कहलाता है |
यदि बहुमत (273 सीट) न हो या बहुमत के प्रधानमंत्री मंत्रिमंडल से प्रस्ताव पारित कराकर
लोकसभा को भंग या विघटित करा सकते हैं |
“संसद
के सत्र” भारतीय संसद के 3 सत्र है |
1 बजट
सत्र - (फरवरी से मई) बड़ा सत्र
2 मानसून
सत्र - (जुलाई से अगस्त)
3 शीतकालीन
सत्र - (नवंबर से दिसंबर) छोटा सत्र
नोट - संसद के किन्ही दो सत्रों के बीच अधिकतम 6 माह का अंतराल होता है जब संसद का सत्र नहीं रहता है तब अस्थाई कानून
राष्ट्रपति बनाता है |
अनुच्छेद
86 –
राष्ट्रपति
का अभिभाषण - राष्ट्रपति का
अभिभाषण प्रत्येक वर्ष संसद की पहली बैठक अर्थात बजट सत्र की पहली बैठक में दोनों
सदनों को संयुक्त रूप से संबोधित करते हैं राष्ट्रपति का अभिभाषण मंत्रिमंडल
द्वारा लिखा गया है |
अनुच्छेद
87 –
राष्ट्रपति का विशेष
अभिभाषण - 5 वर्ष के बाद नवनिर्वाचित लोक सभा की पहली बैठक
को संयुक्त रुप से राष्ट्रपति संबोधित करते हैं |यह किसी भी सत्र में हो सकता है |
अनुच्छेद
88 - सदन में मंत्री तथा महान्यायवादी को विशेष प्रावधान है
जिसके तहत मंत्री तथा महान्यायवादी किसी भी सदन में बोल सकता है किंतु
महान्यायवादी मतदान नहीं कर सकता है मंत्री अपने सदन में जाकर वोट डालता है जबकि
सदन का वह सदस्य होता है |
अनुच्छेद
89 - इसमें राज्यसभा के
सभापति और उपसभापति की चर्चा है राज्यसभा का सभापति किसी भी सदन का सदस्य नहीं
होता क्योंकि वह भारत का उपराष्ट्रपति होता है |
सभापति राज्यसभा
का पदेन (सर्वेसर्वा) होता है अर्थात राज्यसभा में वह सर्वोपरि होता है |
सभापति अपने मत
का प्रयोग नहीं करते हैं किंतु जब पक्ष तथा विपक्ष कामत बराबर हो तो सभापति अपना
मत देते हैं उसका मत निर्णय ला देता है जिसे निर्णायक मत कहते हैं |
सभापति के
अनुपस्थिति में उपसभापति कार्य करते हैं किंतु वह उपराष्ट्रपति का कार्य नहीं करता
है |
राज्यसभा अपने
सदस्यों में से ही उपसभापति को चुनता है अत: उपसभापति राज्यसभा का सदस्य होता है |
नोट - जब सभापति तथा उपसभापति दोनों अनुपस्थित रहे
तो राज्यसभा में से पांच वरिष्ठ सदस्य में से राष्ट्रपति द्वारा चुना गया व्यक्ति
अस्थाई सभापति रहेगा |
अनुच्छेद
93 - इसमें लोकसभा के अध्यक्ष तथा उपाध्यक्ष की चर्चा है लोकसभा
अपने सदस्यों में से ही एक को अध्यक्षता एक उपाध्यक्ष चुन लेती है |
अध्यक्ष लोक सभा
का पदेन होता है |
अध्यक्ष तथा
उपाध्यक्ष दोनों ही लोकसभा के सदस्य होते हैं इन्हें हटाने के लिए लोकसभा में
प्रस्ताव पारित करना होता है
PROTION
स्पीकर - यह अस्थाई अध्यक्ष होता
है यह नवनिर्वाचन सदस्यों को शपथ दिलाता है अध्यक्ष तथा उपाध्यक्ष का निर्वाचन
करता है |
अध्यक्ष तथा उपाध्यक्ष
अलग से सपथ नहीं लेते हैं बल्कि एक सामान्य सदस्य के रूप में PROTION स्पीकर
द्वारा शपथ ले लेता है |
जब अध्यक्ष तथा
उपाध्यक्ष चुन लिया जाता है तो PROTION स्पीकर हट जाता है PROTION स्पीकर उसे
बनाया जाता है जो लोकसभा में वरिष्ठ होता है |]
अध्यक्ष
की शक्तियां –
1.
लोक सभा की बैठक को नियंत्रित करता है |
2.
कोई विधेयक धन
विधेयक है या नहीं इसका निर्धारण स्पीकर करता है |
3.
लोकसभा का
सचिवालय अध्यक्ष के अधीन होता है |
4.
विदेश जाने वाले
संसदीय प्रतिनिधि का नाम ही संयुक्त स्पीकर करते हैं |
5.
गणपूर्ति (1/10 सीट)
के अभाव में लोकसभा की कार्यवाही को अध्यक्ष रोक देता है |
6.
संयुक्त अधिवेशन
की अध्यक्षता लोकसभा अध्यक्ष करते हैं |
7.
संसद के विभिन्न
समितियों के सदस्य की नियुक्ति अध्यक्ष करते हैं |
8.
अध्यक्ष अपने मत
का प्रयोग नहीं करते हैं किंतु पक्ष तथा विपक्ष में मत बराबर होने पर निर्णायक मत
देता है |
अध्यक्ष की दंडात्मक शक्तियां –
1.
अनुशासनहीनता करने पर सदस्य को निलंबित कर देते
हैं |
2.
यदि कोई सदस्य
बिना अनुमति के लगातार 60 दिनों तक अनुपस्थित है तो उसकी सदस्यता रद्द
कर देते हैं |
3.
दल बदल के आधार
पर सदस्यता रद्द कर देते हैं |
अनुच्छेद 98 - संसद का
सचिवालय
अनुच्छेद 99 - सांसदों के
शपथ की चर्चा |
अनुच्छेद 100 –
गणपूर्ति ( CORM ) :--
किसी भी सदन की कार्यवाही शुरू करने के लिए 1/10 सदस्य का होना आवश्यक है इसके
अभाव में सभापति या अध्यक्ष सदस्य की कार्यवाही रोक देती है |
नोट – अध्यक्ष,
उपाध्यक्ष, सभापति, उपसभापति तथा CAG इन्हें संसद का अधिकारी कहा जाता है |
संसदीय
समितियां - इन समितियों के सदस्य की नियुक्ति लोकसभा के अध्यक्ष करते हैं |
स्थाई समिति
प्रत्येक वर्ष गठित की जाती है इसका कार्यकाल 1 वर्ष का होता है स्थाई
समिति तीन प्रकार की होती है |
1.
प्राकलन
समिति - यह धन निकालने के लिए
बजट तैयार करती है सबसे बड़ी स्थाई समिति है इसमें राज्यसभा के सदस्य नहीं बनते
हैं केवल लोकसभा के 30 सदस्य होते हैं |
2.
लोक
लेखा समिति - बजट द्वारा
निकाले गए धन की जांच करती है इसे प्राक्कलन समिति की जुड़वा बहन कहते हैं इसका
अध्यक्ष विपक्षी दल का होता है इसमें लोकसभा से 15 तथा राज्यसभा से 7 सदस्य आते हैं अर्थात कुल 22 सदस्य आते हैं |
3.
सरकारी
उपक्रम समिति – यह सरकारी कंपनी
जैसे – NTPC, BSNL इत्यादि कंपनियों की जांच करती है इसमें लोकसभा से 15 तथा राज्यसभा के 7 सदस्य होते हैं अर्थात कुल 22 सदस्य होते हैं |
अस्थाई समिति - इसका गठन
विशेष परिस्थितियों में किया जाता है इससे तथर्थ समिति करते हैं यह दो प्रकार की
होती है |
1.
परवल
समिति - यह विवादित विधेयक का
गठन व जांच करती है इसमें लोकसभा तथा राज्यसभा के अलग-अलग सदस्य द्वारा कार्य किया
जाता है इसमें लोकसभा के 30 सदस्य होते हैं तथा राज्यसभा के भी सदस्य होते
हैं |
EX. – GST की जांच
2.
संयुक्त
प्रबंल समिति - किसी घोटाले
की जांच करता है |
EX. - बोफोर्स तोप घोटाला
संसद के
विभिन्न प्रस्ताव :-
1.
प्रस्ताव
- संसद को दी गई लिखित
जानकारी प्रस्ताव कहलाता आता है |
2.
विधेयक
- जब किसी प्रस्ताव पर
संसद में चर्चा हो जाती है तो उसे विधेयक कहा जाता है |
3.
कानून - जब किसी विधेयक पर लोकसभा में राज्यसभा तथा
राष्ट्रपति के हस्ताक्षर हो जाए तो उसे कानून कहते हैं |
4.
अधिनियम
- किसी आपात स्थिति पर
नियंत्रण लाने के लिए राष्ट्रपति द्वारा लाया गया अस्थाई कानून अधिनियम या
अध्यादेश कहलाता है |
5.
विशेषाधिकार
प्रस्ताव - किसी मंत्री से स्पष्ट
जानकारी प्राप्त करने को लिए विशेषाधिकार प्रस्ताव कहलाता है |
6.
ध्याना
प्रस्ताव - किसी जरूरी मुद्दे पर
मंत्री का ध्यान आकर्षित करने के लिए लाया जाता है इसे लाने के बाद मंत्री को
स्पष्टीकरण देना होता है |
7.
कार्य
स्थगन प्रस्ताव - किसी आपातकालीन
या अविलंबनिय मुद्दे पर चर्चा करने के लिए इसे लाया जाता है इसे लाने पर संसद में
पहले से चल रही कार्यवाही को रोक दिया जाता है आपातकालीन मुद्दे पर चर्चा की जाती
है | EX. - विदेशी आक्रमण |
8.
कटौती
प्रस्ताव - सरकार जब बजट से अधिक
धन की चर्चा कर देती है तो विपक्ष उसे कम करने के लिए यह लाता है |
9.
निंदा
प्रस्ताव - जब कोई मंत्री अपने
कार्यों को ठीक से नहीं करता है तो उसके विरुद्ध निंदा प्रस्ताव लाया जाता है यह
प्रस्ताव पारित होने पर उस मंत्री को त्यागपत्र देना होता है यदि पूरे मंत्रिमंडल
के विरुद्ध निंदा प्रस्ताव हो जाए तो पूरे मंत्रिमंडल को हटना होता है यह अविश्वास
प्रस्ताव के समान होता है |
10.
अविश्वास
प्रस्ताव - बहुमत या विश्वास मत (273
सीट) के बराबर होता है जब किसी पार्टी के पास 273 सीट से कम हो तो उसके
विरुद्ध अविश्वास प्रस्ताव लाया जाता है यह प्रस्ताव लाने पर उस सरकार को 273 सीटें दिखानी होती हैं यदि 273 सिटी पूरी नहीं हो पाई तो सरकार को हटा दिया
जाता है |
EX. - अटल बिहारी वाजपेई की सरकार इस प्रस्ताव के कारण 13 दिनों में गिर गई थी |
इस प्रस्ताव को लाने पर इसकी सूचना 10 दिनों पहले देनी होती है
|
संसद की कार्यवाही –
1.
प्रश्नकाल
- 11:00 a.m. से 12:00 p.m. - यह संसद का पहला घंटा होता है इसमें विभिन्न
प्रकार के प्रश्न पूछे जाते हैं |
2.
तारांकित
प्रश्न - यह मौखिक पूछे जाते हैं
इसके स्पष्टीकरण के लिए पूरक प्रश्न भी पूछे जाते हैं पूरक प्रश्न के अधिकतम
संख्या तीन होती है |
3.
अतारांकित
प्रश्न - यह लिखित में पूछे जाते
हैं जिस कारण 10 दिन पूर्व सूचना दी जाती है इसमें पूरक प्रश्न
नहीं पूछे जाते हैं |
4.
शून्यकाल
- 12:00 पी.एम. से 1:00 पी.एम. संसद का दूसरा घंटा होता है इसमें कोई
भी नियम कानून नहीं लागू होता है यह नाम भारतीय मीडिया ने दिया है |
5.
LUNCH
- 1:00 से 2:00 पी.एम. - संसद को भोजन IRCTC करवाती है |
नोट – लंच के बाद उन
सांसदों को बोलने का मौका दिया जाता है जिन्हें मौका नहीं मिला था |
NORTH BLOCK मैं वित्त मंत्रालय, गृह मंत्रालय
SOUTH ब्लाक में रक्षा मंत्रालय, विदेश मंत्रालय तथा प्रधानमंत्री कार्यालय
(PMO) है जो अधिक शक्तिशाली है |
INDIA GATE का निर्माण 1921 में लूटीन ने करवाया था जो प्रथम विश्व युद्ध
में मारे गए अज्ञात सैनिकों की याद में था |
अनुच्छेद
108—
संयुक्त अधिवेशन -
यह तब बुलाया जाता है जब दोनों सदनों में विवाद हो जाए इसे राष्ट्रपति बुलाते हैं
इसकी अध्यक्षता लोकसभा का स्पीकर करता है |
यह तीनों
परिस्थितियों में यह बुलाया जाता है |
1.
एक सदन द्वारा
पारित विधेयक को दूसरा सदन पारित न करें |
2.
एक सदन द्वारा
पारित विधेयक को दूसरा सदन 6 माह से अधिक देर तक रोके |
3.
एक सदन द्वारा
दिया गया सुझाव दूसरा सदन मानने से इंकार करें |
नोट - संविधान संशोधन तथा धन विधेयक पर संयुक्त
अधिवेशन नहीं आ सकता है अब तक तीन बार संयुक्त अधिवेशन बुलाया गया है |
1.
दहेज
अधिनियम - 1961
2.
बैंकिंग
– 1978
3.
POTA -
2001
अनुच्छेद
109 - धन विधेयक के बारे में विशेष प्रावधान
1.
यह पहले लोकसभा
से ही प्रारंभ होता है |
2.
राज्यसभा इसे 14 दिनों से अधिक नहीं रोक सकती है |
3.
धन विधेयक पर
दिया गया प्रस्ताव लोकसभा मानने के लिए बाध्य नहीं है |
4.
कोई भी दे धन
विधेयक है या नहीं इसका निर्धारण लोकसभा अध्यक्ष करता है |
5.
यह विधेयक
राष्ट्रपति के पूर्व अनुमति से आता है अतः इसे राष्ट्रपति पुनर्विचार के लिए नहीं
लौटा सकते हैं |
अनुच्छेद
110 - इसमें धन विधि की परिभाषा है इसके अनुसार
संचित निधि (सरकारी खाता) परिभाषित होने वाला विधेयक धन विधेयक कहलाता है किसी
टैक्स को बढ़ाने या घटाने वाला विधेयक इसी के अंतर्गत आता है |
अनुच्छेद
111 - विधेयक पर राष्ट्रपति की अनुमति किसी विधेयक पर राष्ट्रपति
तीन प्रकार की प्रतिक्रिया करते हैं |
1.
विधेयक को रद्द
करते हैं - 42वां संशोधन द्वारा यह अधिकार छीन लिया गया |
2.
पुनर्विचार - विधेयक को पुनर्विचार के लिए लौटा सकते हैं
यह अधिनियम 44 वां संशोधन द्वारा दिया गया |
3.
विधेयक पर जेबी
विटो कर सकते हैं |
अनुच्छेद
112 - इसमें बजट की चर्चा है बजट का अर्थ होता है -चमड़े का थैला |
संविधान में बजट
शब्द की चर्चा नहीं है इसके स्थान पर वार्षिक वित्तीय विवरण की चर्चा है |
बजट लोकसभा में
पहले प्रस्तुत होता है |
बजट प्रस्तुत
करने का अधिकार राष्ट्रपति को है किंतु यह वित्त मंत्री या किसी अन्य मंत्री से
इसे प्रस्तुत करवाते हैं |
बजट में केवल इस
बात की चर्चा की जाती है कि कौन-कौन से विकासात्मक कार्यों को करना है बजट द्वारा
धन नहीं निकालना है |
अनुच्छेद
113 –
प्राक्कलन
- बजट में किए गए घोषणाओं
पर कितना खर्चा आएगा इस खर्च का प्रकलन किया जाता है |
अनुच्छेद
114 –
विनियोग विधेयक -
प्राकलन मैं बताए गए धन को निकालने के लिए संसद में विनियोग विधेयक पारित करना
होता है जब तक विनियोग पर इतना हो जाए तब तक धन नहीं निकल सकता संसद को राष्ट्रीय
कोष (धन) का रक्षक कहा जाता है |
अनुच्छेद
115 –
अतिरिक्त/अनुपूरक
अनुदान - विनियोग विधेयक द्वारा
दिया गया धन महंगाई बढ़ने के कारण कम पड़ जाता है जिस कारण काम रुक जाता है अतः
पूरा काम करने के लिए अतिरिक्त धन को अतिरिक्त अनुदान नामक विधेयक से लिया जाता है
|
EX. - पाटलिपुत्र
में बनने वाला दीघा पुल
अनुच्छेद
116 –
लेखानुदान
- विनियोग विधेयक पारित
करने में सरकार को समय लगता है अतः सरकार काम को जल्दी प्रारंभ करने के लिए
लेखानुदान के माध्यम से कुछ ADVANCE पैसे निकाल देती है |कभी-कभी लेखानुदान तो
पारित हो जाता है किंतु विनियोग विधेयक पारित नहीं होता है जिस कारण काम अधूरा पड़
जाता है |
अनुच्छेद
117 –
वित्त विधेयक - आगामी वर्ष में किया जाने वाला विकासात्मक कार्य FINANCE
BILL कहलाता है यह लोकसभा तथा राज्यसभा दोनों में प्रस्तुत हो सकता है |
अनुच्छेद
120 –
संसद
में प्रयोग की जाने वाली भाषा - संसद में केवल
हिंदी या इंग्लिश में प्रयोग हो सकता है |
यदि किसी संसद को
यह दोनों भाषा में आए तो वह सभापति/अध्यक्ष से अनुमति लेकर अपनी क्षेत्रीय भाषा
में बोल सकता है |
अनुच्छेद
121 - संसद जजों के आचरण कार्यप्रणाली इत्यादि पर
चर्चा नहीं कर सकता किंतु उन पर महाभियोग लगा सकता है |
अनुच्छेद
122 - न्यायालय द्वारा संसद की कार्यवाही की जांच
नहीं की जाएगी किंतु विधेयक संवैधानिक है या नहीं इसकी जांच होगी |
अनुच्छेद
123 –
राष्ट्रपति
का अध्यादेश - जब संसद का कोई सत्र न
चल रहा हो तथा कोई आपातकालीन कानून की जरूरत हो तो मंत्रिमंडल की सिफारिश पर
राष्ट्रपति अस्थाई कानून बना लेते हैं जिसे अध्यादेश कहते हैं |
राष्ट्रपति
अध्यादेश को कभी भी वापस ले सकता है |
एक राष्ट्रपति
चाहे जितनी बार अध्यादेश ला सकता है |
अध्यादेश की
अधिकतम अवधि छ: माह होती है क्योंकि दो सत्रों के बीच एक अधिकतम अंतराल छ: माह
होता है |
यदि इस 6 माह के भीतर कोई सत्र प्रारंभ हो जाए तो अध्यादेश की अवधि मात्र 42 दिन रह जाती है इसे स्थाई कानून बनाने के लिए 42 दिन 6 माह के भीतर संसद द्वारा इसे पारित करना होगा अन्यथा अध्यादेश समाप्त हो जाएगा
|
“सर्वोच्च/उच्चतम न्यायालय”
अनुच्छेद
124 – इसमें SC के गठन की चर्चा है | SC मैं 30 +
1 जज बैठते हैं |
SC मैं जजों की
संख्या वृद्धि का अधिकार संसद को है |
SC मैं जज बनने
के लिए भारत के किसी भी हाईकोर्ट में 5 साल जज या 10 साल वकील साथ ही राष्ट्रपति के नजर में कानून का अच्छा जानकार होना चाहिए |
सुप्रीम कोर्ट
में जजों की नियुक्ति राष्ट्रपति करते हैं जज के व्यक्ति की नियुक्ति के समय
राष्ट्रपति कोलोजियम से सलाह लेते हैं |
नोट - सुप्रीम कोर्ट के 5 सीनियर जजों को कोलोजियम कहते हैं |
जजों को हटाने के
लिए महाभियोग जैसी प्रक्रिया लानी होती है |
अब तक किसी जज को
महाभियोग द्वारा हटाया नहीं गया है |
सुप्रीम कोर्ट के
जज रामास्वामी के विरुद्ध महाभियोग लाया गया था किंतु पारित नहीं हो सका |
सुप्रीम कोर्ट के
जज 65 वर्ष तक कार्यरत रहते हैं यह अपना त्यागपत्र राष्ट्रपति को
देते हैं |
अनुच्छेद
125 - जजों का वेतन - जजों को संचित निधि से वेतन दिया जाता है
जिसमें कटौती नहीं की जाती है |
CJI को 2,80,000 दिया जाता है तथा अन्य जजों को 2,50,000 रुपया दिया जाता है |
अनुच्छेद
126 – जब CJI अनुपस्थित रहता है तो कुछ जजों में
से ही एक मुख्य न्यायाधीश बनता है जिसे कार्यकारी मुख्य न्यायाधीश कहते हैं |
इसके वेतन
शक्तियां भत्ते CJI के बराबर होता है किंतु ये अस्थाई होते हैं |
अनुच्छेद
127 – AD जज का अर्थ होता है इस उद्देश्य के लिए
तदर्थ न्यायाधीश (AD जज) की संख्या में कमी हो जाए तब इसे लाने की सिफारिश CJI
राष्ट्रपति से करते हैं सिफारिश के आधार पर राष्ट्रपति 25 हाई कोर्ट से AD जज के लिए सिफारिश करते हैं |
AD जज का वेतन
भत्ता तथा शक्ति सुप्रीम कोर्ट के जज के बराबर होते हैं किंतु ये स्थाई जज नहीं
होते हैं |
अनुच्छेद
128 – जब AD जज उपलब्ध नहीं हो तो सेवानिवृत्त सुप्रीम
कोर्ट के जज को लाया जाता है |
अनुच्छेद
129 - सुप्रीम कोर्ट अभिलेख
न्यायालय (नजीर) का कार्य करती है अर्थात सुप्रीम कोर्ट का निर्णय किसी अन्य
मुकदमे में भी उदाहरण के रूप में प्रस्तुत किया जाता है ताकि न्याय जल्दी मिल जाए |
अनुच्छेद
130 - सुप्रीम कोर्ट का स्थान - सुप्रीम कोर्ट दिल्ली में है किंतु CJI के
कहने पर राष्ट्रपति इसका खंडपीठ किसी अन्य शहर में खोल सकते हैं |
सुप्रीम कोर्ट के
कुछ जजों ने मामले की त्वरित सुनवाई के लिए हैदराबाद तथा जम्मू-कश्मीर में अस्थाई
खंडपीठ डाला था |
अनुच्छेद 131 –
सुप्रीम कोर्ट की
प्रारंभिक/मूल अधिकारिता
इसके अंतर्गत ऐसे
मामले को रखते हैं जो केवल सुप्रीम कोर्ट में सुलझाया जा सकता हैं |
इसमें तीन मुकदमे
आते हैं |
1.
केंद्र
राज्य विवाद
2.
राज्य
राज्य विवाद
3.
एक और
केंद्र एवं उसके साथ कुछ अन्य राज्य तथा दूसरी और अन्य राज्य विवाद |
नोट - राष्ट्रपति तथा उपराष्ट्रपति का विवाद भी
सीधे सुप्रीम कोर्ट में जाता है किंतु इसे मूल अधिकारिता में शामिल नहीं करते हैं
क्योंकि इसकी चर्चा अनुच्छेद 71 में है |
अनुच्छेद
132 - हाईकोर्ट से सुप्रीम कोर्ट में अपील करने का अधिकार |
अनुच्छेद
137 - न्यायिक पुनर्वालोकन अर्थात सुप्रीम कोर्ट अपने ही फैसले
को बदल सकती है |
EX. - सुप्रीम कोर्ट ने चंपकन दोहराई राजन मामला (1960) तथा बेरुबरी मामला (1960) मैं यह प्रस्तावना को संविधान का अंग नहीं
माना, किंतु केसवानंद भारती मामले में सुप्रीम कोर्ट में न्यायिक पुनर्वालोकन का
प्रयोग करके अपने फैसले को बदल दिया और प्रस्तावना को संविधान का अंग मान लिया और
कहा कि संसद इस में संबोधन कर सकती है साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने मूल ढांचा का
सिद्धांत दिया कहा कि संसद ऐसा कोई परिवर्तन नहीं कर सकती जिसमें कि संविधान का
मूल ढांचा प्रभावित हो |
इसी
कारण आज भी केवल है अनुच्छेद - 395 है
इसमें करके A, B, C, D जोड़ा गया है |
अनुच्छेद
139 - मूल अधिकार के अलावा
किसी अन्य मामले पर रीट निकालना हो तो सुप्रीम कोर्ट अनुच्छेद - 32 का प्रयोग न करके अनुच्छेद - 139 का प्रयोग करेगी |
EX. - सरकारी मास्टर पर परमादेश रीट जारी करना हो तो
अनुच्छेद - 32 के अंतर्गत होगा |
जबकि रेलवे किसी
कर्मचारी पर रीट जारी करता है तो अनुच्छेद - 139 का प्रयोग होता है |
अनुच्छेद
141 - सुप्रीम कोर्ट का निर्णय भारत के सभी न्यायालय पर मान्य है
|
यदि कोई व्यक्ति
न्यायालय की बात नहीं मानता है तो उसे अवमानना समझ कर न्यायालय उसे दंडित कर देगा |
अनुच्छेद
142 - राष्ट्रपति किसी मुकदमे पर
सुप्रीम कोर्ट से सलाह मांग सकते हैं लेकिन उस सलाह को मानने के लिए बाध्य नहीं है
|
EX. - 1993 में राष्ट्रपति
डॉ शंकर दयाल शर्मा ने बाबरी मस्जिद राम जन्मभूमि पर सलाह मांगी किंतु न्यायालय ने
कोई सलाह नहीं दिया अर्थात सलाह देने से मना कर दिया |
सुप्रीम कोर्ट
संविधान का अंतिम व्याख्या करता है यह एक निष्पक्ष तथा स्वायत्त संस्था है यह अपनी
स्वायत्त/निष्पक्ष बनाए रखने के लिए सभी नियुक्तियां स्वयं करता है सुप्रीम कोर्ट
SSC या अन्य संस्था द्वारा नहीं करता है |
सुप्रीम कोर्ट के
कर्मचारियों की पदोन्नति निलंबन तथा स्थानांतरण स्वयं सुप्रीम कोर्ट करता है |
कर्मचारी तथा
जजों का वेतन संचित निधि से दिया जाता है संसद इसमें कटौती नहीं कर सकती है |
CAG ( COMPTILLES
& AUDITOR GENERAL )नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक
CAG की चर्चा अनुच्छेद - 148 से 151 तक है |
अनुच्छेद
148 - इसमें CAG के पद की चर्चा है CAG कि नियुक्ति प्रधानमंत्री
की सलाह पर राष्ट्रपति करते हैं यह 65 वर्ष आयु या 6 वर्ष तक कार्यकाल अपने पद पर रहते हैं |
यह राष्ट्रपति के
प्रसाद पर्यंत नहीं होते हैं बल्कि इन्हें हटाने के लिए महाभियोग जैसी प्रक्रिया
लानी होती है |
यह अपना
त्यागपत्र राष्ट्रपति को दे सकते हैं मंत्रिपरिषद का कोई सदस्य CAG नहीं हो सकता
है |
अनुच्छेद
149 - इसमें CAG की शक्ति की चर्चा है CAG भारत के लेखा विभाग का
प्रधान होता है अर्थात केंद्र या राज्य सरकार द्वारा किसी भी खर्च की जांच CAG कर
देता है |
अनुच्छेद
150 – CAG केंद्र और राज्य दोनों के ही लेखकों की जांच कर सकता है |
अनुच्छेद
151 – CAG केंद्र सरकार राज्य के लेखकों की जांच की रिपोर्ट
राष्ट्रपति को देता है |
नोट - CAG की रिपोर्ट को लोक लेखा समिति जांच करती
है |
भाग 6 (
राज्य )
अनुच्छेद
152 - राज्य की परिभाषा - राज्य के पास क्षेत्रफल जनसंख्या तथा शासन यह
तीनों चीजें होती है किंतु संप्रभुता नहीं होती है जिस कारण उसे राज्य कहते हैं |
अनुच्छेद
153 - राज्यपाल का पद राज्यपाल का पद कनाडा से
लिया गया है प्रत्येक 1 राज्य का एक राज्यपाल होगा किंतु 2 राज्यों का एक ही राज्यपाल हो सकता है इस स्थिति में उसका वेतन उतना ही होगा
किंतु राष्ट्रपति के कहने पर दोनों राज्य मिल कर देंगे |
अनुच्छेद
154 - राज्यपाल कार्यपालिका का प्रधान होता है
किंतु वह औपचारिक प्रधान होता है वास्तविक प्रधान मुख्यमंत्री होता है कार्यपालिका
के अंतर्गत विभिन्न कार्यों को किया जाता है जिस के राज्यपाल को अलग-अलग शक्तियां
प्राप्त है \
1.
कार्यकारी
शक्ति - इसके अंतर्गत राज्यपाल,
मुख्यमंत्री, मंत्रियों तथा विभिन्न पदाधिकारियों की नियुक्ति करते हैं |
2.
विधायी
शक्ति - यह नियम कानून से
संबंधित होता है इसके तहत राज्यपाल विधानमंडल के सत्र को बुलाते हैं तथा सत्रावसान
करते हैं ये विधेयक पर जब तक हस्ताक्षर न कर दे विधेयक कानून नहीं बनता है |
3.
वित्तीय
शक्ति - इसके अंतर्गत राज्यपाल
से इमरजेंसी फंड पैसा निकाल सकता है पंचायतों के वित्तीय स्थिति में सुधार के लिए “राज्य
वित्त आयोग” का गठन करते हैं |
4.
क्षमादान
शक्ति - अनुच्छेद - 161 के तहत राज्य राज्यपाल सजा माफ कर सकता है किंतु सेना के कोर्ट की सजा तथा
मृत्युदंड माफ नहीं कर सकता है |
5.
आपातकालीन
शक्ति - राज्यपाल को आपातकालीन
शक्ति प्राप्त नहीं है किंतु राष्ट्रपति शासन के दौरान राज्य की सभी शक्तियां
राज्यपाल के हाथों में चली जाती है |
6.
विवेकाधिकार
शक्ति - इसके अंतर्गत राज्यपाल
बिना किसी की सलाह लिए अपने विवेक करते हैं यह तब किया जाता है जब किसी को बहुमत
ना मिले इस स्थिति में राज्यपाल किसी भी दल के नेता को सीएम बना देते हैं उसे 30 दिनों के भीतर बहुमत सिद्ध करने को कहते हैं |
7.
विशेषाधिकार
शक्ति - इसके तहत राज्यपाल को
अनुच्छेद - 14 के अपवाद स्वरूप कुछ विशेष अधिकार है राज्यपाल
को उसके पद के दौरान आपराधिक मुकदमा नहीं चलाया जा सकता है |राज्यपाल राज्य के सभी
विश्वविद्यालयों का चांसलर कुलाधिपति होते हैं |
नोट - राष्ट्रपति के पास जब कोई विधेयक जाता है तो
उस विधेयक को या तो एक बार लौटा सकता है या जेबी वीटो कर सकता है जबकि राज्यपाल
किसी विधेयक को एक बार लौटा सकता है |
जेबी वीटो कर
सकता है ता राष्ट्रपति को भेजने के लिए सुरक्षित रख सकता है अर्थात राज्यपाल का
विवेकाधिकार शक्ति राष्ट्रपति से अधिक है |
अनुच्छेद
155 - राज्यपाल की नियुक्ति की चर्चा है इसकी नियुक्ति
प्रधानमंत्री की सलाह पर राष्ट्रपति करते हैं |
अनुच्छेद
156 - राज्यपाल का कोई निश्चित कार्यकाल नहीं होता है वह
राष्ट्रपति के प्रसादपर्यंत अपने पद पर रहते हैं |
अनुच्छेद
157 - राज्यपाल की योग्यताएं –
1.
भारत का नागरिक हो
|
2.
पागल दिवालिया ने हो |
3.
लाभ के पद पर न
हो |
4.
कम से कम 35 वर्ष आयु हो |
अनुच्छेद
158 - राज्यपाल के लिए शर्तें –
1.
वह विधानमंडल/संसद का किसी भी सदन का सदस्य ने
हो |
2.
वह उस राज्य का
निवासी नहीं होना चाहिए जिस राज्य का राज्यपाल बनने जा रहा हो |
अनुच्छेद
159 - राज्यपाल को शपथ हाईकोर्ट के मुख्य
न्यायाधीश दिलाते हैं |
अनुच्छेद
160 - ऐसी आकस्मिक स्थिति जिसकी चर्चा संविधान में नहीं है उसे
नियंत्रित करने के लिए राष्ट्रपति राज्यपाल को बोल सकते हैं |
अनुच्छेद
161 - राज्यपाल की क्षमता शक्ति |
फांसी सजा नहीं
माफ कर सकते |
सैन्य सजा नहीं
माफ कर सकते |
अनुच्छेद
162 - राज्य की
कार्यपालिका शक्ति का प्रधान विस्तार राज्यपाल करेंगे |
अनुच्छेद
163 - राज्यपाल को
सहायता एवं सलाह के लिए एक मंत्री परिषद होगी जिसके अध्यक्ष मुख्यमंत्री होंगे |
अनुच्छेद
164 - मुख्यमंत्री के सलाह पर राज्यपाल
अन्य मंत्रियों की नियुक्ति करेंगे |
मुख्यमंत्री के कर्तव्य एवं शक्तियां –
1.
मुख्यमंत्री
राज्य कार्यपालिका का वास्तविक प्रधान होता है |
2.
वह विधानमंडल की
सूचना राज्यपाल को देता है |
3.
वह किसी मंत्री
की नियुक्ति या हटाने की सिफारिश राज्यपाल से करता है |
4.
मुख्यमंत्री
राष्ट्रीय विकास परिषद के सदस्य होते हैं |
5.
मुख्यमंत्री के
त्याग या मृत्यु होने से मंत्रिपरिषद भंग हो जाता है एवं नया सीएम अपने अनुसार
मंत्रिपरिषद बनाता है |
6.
मुख्यमंत्री
विभिन्न पदाधिकारियों संबंधित सिफारिश राज्यपाल को करता है |
अनुच्छेद
165 – महाधिवक्ता (ADVOCATE GENERAL ) - राज्य सरकार को कानूनी सहायता देने के लिए
एक महाधिवक्ता होता है यह राज्य सरकार का प्रथम विधि अधिकारी होता है | यह
विधानमंडल की कार्यवाही में भाग लेता है किंतु उसका सदस्य न होने के कारण वोट नहीं
कर सकता है यह राज्यपाल के प्रसादपर्यंत होते हैं इसकी योग्यता हाई कोर्ट के जज के
बराबर है |
अनुच्छेद
168 - इसमें विधानमंडल या विधान भवन की चर्चा है |
यह राज्य की कानून बनाने की संस्था है |
इसके 3 अंग हैं |
1.
विधान
सभा
2.
विधान
परिषद
3.
राज्यपाल
|
विधानमंडल के दो
सदन होते हैं |
1.
विधानसभा
2.
विधान
परिषद |
अनुच्छेद
169 - इसमें विधान परिषद के सर्जन (निर्माण) की
चर्चा है जिन राज्यों को विधान परिषद का निर्माण करना है यहां की विधान विधान सभा
इसका प्रस्ताव पारित करके संसद को भेजेगी संसद के अनुमोदन के बाद उस राज्य में
विधान परिषद बन जाएगी वर्तमान में यह प्रस्ताव राजस्थान सरकार ने पारित कर भेजा है
|
अनुच्छेद
170 - इसमें विधानसभा की चर्चा है विधानसभा भंग हो सकता है अतः
इसे अस्थाई सदन या निम्न सदन कहते हैं |
इसके भाव मत दल
के नेता को सीएम बनाया जाता है अतः इसे प्रथम सदन कहते हैं इसका चुनाव जनता
प्रत्यक्ष करती है अत: इसे प्रत्यक्ष सदन कहते हैं |
इसका सदस्य बनने
के लिए न्यूनतम 25 वर्ष आयु होनी चाहिए अतः इसे युवाओं का सदन
कहते हैं |
विधानसभा में
अधिकतम सीटों की संख्या 500 तथा न्यूनतम सीटों की संख्या 60 होती है |
अनुच्छेद
171 - विधान परिषद ( LEGISLETIVE
COUNSIL ) - इसकी चर्चा अनुच्छेद -
17 में है इसका विघटन नहीं हो सकता है अतः इसे उच्च सदन या स्थाई सदन कहते हैं |
इसका चुनाव जनता
अप्रत्यक्ष करती है अतः इसे अप्रत्यक्ष सदन कहते हैं इस में बहुमत दल के नेता को
मुख्यमंत्री नहीं बनाया जाता है अतः इसे द्वितीय सदन कहते हैं इसका सदस्य बनने के
लिए न्यूनतम आयु 30 वर्ष होनी चाहिए अतः इसे वर्द्धो का सदन कहते
हैं |
इसके अधिकतम
सीटों की संख्या विधानसभा के 1/3 होती है |
इसके सदस्यों का
चुनाव पांच श्रेणियों द्वारा होता है |
1.
एक तिहाई सदस्य
विधान सभा चुनती है |
2.
एक तिहाई सदस्य
को स्थानीय निकाय (पंचायत) के सदस्य चुनते हैं |
3.
1/6 सदस्यों को
राज्यपाल मनोनीत करता है \
4.
सदस्य को
माध्यमिक शिक्षा परिषद के सदस्य (शिक्षक) चुनते हैं |
5.
½ सदस्य को स्नातक
पास (3 साल पूर्ण) हो चुके विद्यार्थी चुनते हैं |
नोट - विधानसभा के सदस्य को Member of Logeslotive
Acembiy ( MLA ) तथा विधान परिषद के सदस्य को Member of Logeslotive Acembiy ( MLA
) कहते हैं |
अनुच्छेद
1 72 - सदनों
की अवधि - विधान परिषद एक स्थाई
सदन है इसके सदस्यों का कार्यकाल 6
वर्ष होता है जबकि
विधानसभा का कार्यकाल 5 वर्ष का होता है |
अनुच्छेद
173 - इसमें विधान मंडल के सदस्यों की योग्यता है |
1.
वह भारत का
नागरिक हो |
2.
पागल दीवालिया न
हो |
3.
किसी लाभ के पद
पर न हो |
4.
विधानसभा के लिए
न्यूनतम आयु 25 वर्ष |
5.
तथा विधान परिषद
के लिए न्यूनतम आयु 30 वर्ष है |
अनुच्छेद
182 - इसमें विधान परिषद के सभापति तथा उपसभापति
की चर्चा है इन्हें विधानसभा के सदस्य चुनते हैं विधानसभा के सदस्य ही प्रस्ताव
पारित करके हटा सकते हैं |
विधान परिषद का
सभापति उप राज्यपाल नहीं हो सकता है |
HIGH COURT ( उच्च न्यायालय )
सुप्रीम कोर्ट की
व्यवस्था USA से लिया गया है जबकि भारत में पहली बार हाईकोर्ट की स्थापना 1861 के अधिनियम के द्वारा 1862 में कोलकाता, मुंबई तथा मद्रास में खोला गया |
हाई कोर्ट का
वर्तमान स्वरूप भारत शासन अधिनियम 1935 से लिया गया है |
अनुच्छेद
214 - इसमें हाईकोर्ट के गठन की चर्चा है प्रत्येक राज्य का एक
हाईकोर्ट होगा |
यदि राज्य बहुत
बड़ा है तो एक ही राज्य में उसे हाईकोर्ट के खंडपीठ खोले जाएंगे |
EX. –
UP = लखनऊ + इलाहाबाद |
छोटे राज्यो का
एक संयुक्त हाईकोर्ट हो सकता है |
EX. - गुवाहाटी
सर्वाधिक
जज इलाहाबाद हाई कोर्ट में है (160)
जबकि
राज्यों का क्षेत्राधिकार गुवाहाटी हाई कोर्ट का है |
हाईकोर्ट में
राज्यों की संख्या वृद्धि का अधिकार राष्ट्रपति को है जबकि सुप्रीम कोर्ट के जजों
की संख्या वृद्धि का अधिकार संसद को है |
हाई कोर्ट में जज
बनने के लिए डिस्ट्रिक्ट कोर्ट में 10 साल वकील या 5 साल जज होना चाहिए साथ ही राज्यपाल की नजर में कानून का अच्छा जानकार होना
चाहिए |
हाईकोर्ट में
जजों की नियुक्ति संबंधी सिफारिश सुप्रीम कोर्ट का मुख्य न्यायाधीश हाई कोर्ट का
मुख्य जज एवं राज्यपाल मिलकर राष्ट्रपति की सहायता से करते हैं |
हाई कोर्ट के जज
को शपथ राज्यपाल दिलाते हैं किंतु हाई कोर्ट का जज अपना त्यागपत्र राष्ट्रपति को
देते हैं |
यह 65 वर्ष की आयु तक अपने पद पर रहते हैं इससे पहले भी इन्हें संसद के महाभियोग
द्वारा हटाया जा सकता है |
नोट - सुप्रीम कोर्ट के जज रामास्वामी के विरुद्ध
संसद में महाभियोग चला जबकि पंजाब, हरियाणा, हाईकोर्ट के जज रंगास्वामी के विरुद्ध
महाभियोग चला |
किंतु यह दोनों
महाभियोग पारित नहीं हो सका |
सुप्रीम कोर्ट के
जजों को केंद्रीय संचित निधि से तथा हाई कोर्ट एवं डिस्टिक कोर्ट के जजों का वेतन
राज्य को संचित निधि से दिया जाता है |
अनुच्छेद
226 - के तहत हाई कोर्ट
भी पांच प्रकार के रीट जारी कर सकता है |
डिस्ट्रिक्ट कोर्ट के मुकदमे की अपील हाईकोर्ट में की जा सकती है किंतु सीधा
मुकदमा हाईकोर्ट में नहीं होता है |
कुछ मुकदमे जो
सीधे हाई कोर्ट में जा सकते हैं |
1.
MP तथा MLA का
विवाद |
2.
कंपनी विवाद |
3.
विवाह या तलाक |
4.
वसीयत (उत्तराधिकारी)
का मामला \
5.
मूल अनुच्छेद का
मामला (अनुच्छेद – 226)
6.
कर्मचारियों के
संवैधानिक स्थिति की जांच |
7.
जनहित याचिका
(PIL) ( Public Interst Littigodion )
भारत में कुल 25 हाईकोर्ट है दिल्ली एकमात्र केंद्र शासित प्रदेश है जिसका अपना हाई कोर्ट है |
डिस्टिक
कोर्ट की चर्चा अनुच्छेद - 233 में है इसका जज बनने के लिए राज्य न्यायिक सेवा की परीक्षा देनी होती है या
हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश की सलाह पर राज्यपाल नियुक्त कर सकता है |
दिवानी
मुकदमा - धन या जमीन से संबंधित
मुकदमा दिवानी मुकदमा कहलाता है |
इसे कोर्ट में
सुलझाया जाता है |
EX. - जमीन विवाद, दहेज विवाद, वसीयत मामला इत्यादि |
नोट - जब सरकार का पैसा लूटा जाता है तो उसे राजसव
कहते हैं |
EX. - टैक्स चोरी, बिजली चोरी इत्यादि |
फौजदारी
मुकदमा – मार-पीट से संबंधित
मुकदमा को फौजदारी मुकदमा कहते हैं |
इसे सत्र
न्यायालय द्वारा समझाया जाता है |
EX. – हत्या, डकैती, लूट, धमकी, अपहरण, रेप
इत्यादि |
लोक
अदालत - इस अदालत में मुकदमे पर
फैसले नहीं सुनाए जा सकते हैं बल्कि आपस में समझौता करा दिया जाता है |
लोक अदालत के समझौते या फैसले के विरुद्ध हाई
कोर्ट या सुप्रीम कोर्ट में अपील नहीं किया जा सकता है |
परिवार
न्यायालय ( FAMILY COURT ) - इसकी स्थापना
सन 1984 में हुई थी इसमें छोटे-मोटे पारिवारिक मुद्दे आते हैं |
EX. – सास-बहू विवाद इत्यादि |
जनहित
याचिका (Public Interst Littigodion ) - इसकी शुरुआत 1980 में अमेरिका से
हुई |
भारत में इसकी
शुरुआत 1986 में CJI पी.एन. भगवती कार्यकाल में हुई |
यह केवल सुप्रीम
कोर्ट या हाई कोर्ट में किया जा सकता है |
EX. =-
वैज्ञानिकों का वेतन वृद्धि मुकदमा |
भाग – 07
अनुच्छेद 238 (समाप्त)
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